हे पितः !
तुम्हारे द्वारा दी गई
पूर्णाहुति
कैसे विसर्जित की जा सकती है
पानी में
उससे तो
अभिषेक करना है हमें
वो शोभा है
हमारे ललाट की
और स्मृति भी
कि-
जीवन भर संघर्षों कि ज्वाला में
जलकर
करते रहे वर्षा हम पर
स्नेह की
हे पितः !
तुम्हारे द्वारा दी गई पूर्णाहुति
व्यर्थ नही जायेगी
वह हमारे उद्विकास में
नवीन चेतना लाएगी
व्यक्ति उत्थान से
लोक उत्थान तक
अनवरत विजयी होगी
जो संकल्प तुमने दिया है
जिजीविषा बन
हममें सदा रहेगी
मुझे याद है तुम्हारी पुकार
जो निरंतर उठती है मुझमें
बन संकल्प ज्वार -
"उठो ! जागो !
और उद्यम को प्राप्त हो
निर्निमेष काल से अभिसिंचित
प्रगति का पोषण करो
प्रिय पुत्र ! हर स्थिति में
ईश पर विश्वास कर
शक्ति का संवरण करो " .
Saturday, August 23, 2008
माँ
माँ
सिर्फ़ एक शब्द नही
एक भाव
ममत्व का
माँ
सिर्फ़ पोषक नही
एक प्यार
जीवन का
माँ
सिर्फ़ अस्थियों का ढांचा नही
एक आकार
स्नेह का
माँ
सिर्फ़ एक सम्बन्ध नही
एक स्रोत करुणा का .
सिर्फ़ एक शब्द नही
एक भाव
ममत्व का
माँ
सिर्फ़ पोषक नही
एक प्यार
जीवन का
माँ
सिर्फ़ अस्थियों का ढांचा नही
एक आकार
स्नेह का
माँ
सिर्फ़ एक सम्बन्ध नही
एक स्रोत करुणा का .
Saturday, August 16, 2008
किस बात की तुमको हताशा ?
किस बात की तुमको हताशा
टूटती जब नही आशा
मानवी की प्रकृति है ये
जो बदलती जा रही है
रेत जैसी जिंदगी
हर क्षण फिसलती जा रही है
क्या हुआ जो एक स्वप्न
टूटा तुम्हारा
क्या हुआ जो एक साथी
छूटा तुम्हारा
प्रकृति है अनुरागिनी
अनुराग उसको है सभी से
तुम चलो अब साथ उसके
और देखो नए सपने
टूटकर भी नही खोते
ह्रदय अपने प्यार को
फ़िर तुम्हे कैसी निराशा
टूटती जब नही आशा
किस बात की तुमको हताशा .
टूटती जब नही आशा
मानवी की प्रकृति है ये
जो बदलती जा रही है
रेत जैसी जिंदगी
हर क्षण फिसलती जा रही है
क्या हुआ जो एक स्वप्न
टूटा तुम्हारा
क्या हुआ जो एक साथी
छूटा तुम्हारा
प्रकृति है अनुरागिनी
अनुराग उसको है सभी से
तुम चलो अब साथ उसके
और देखो नए सपने
टूटकर भी नही खोते
ह्रदय अपने प्यार को
फ़िर तुम्हे कैसी निराशा
टूटती जब नही आशा
किस बात की तुमको हताशा .
समर्पण
आस्थाएँ टूटें नही
उस अनजान के प्रति
जो सदा ढांढस बंधाता
तुम हुए असफल
भला फ़िर क्या हुआ
हारना था एक को
तुम ही सही
एक कोशिश और हो
नए संदर्भों में
क्या पता तुम विजित हो
आख़िर भवितव्यता है
हाथ उसके
क्या पता तुम पा सको
सत्य अपने
खोजना तो सबको पड़ा है
रास्ता उस छोर का
मंजिलें आकर सभी
ख़त्म हो जाती जंहाँ
और है प्रारम्भ जिसपर
अनंत का वैभव निरंतर
धड़कनें कहतीं जहाँ हैं -
सत्य है केवल समर्पण .
उस अनजान के प्रति
जो सदा ढांढस बंधाता
तुम हुए असफल
भला फ़िर क्या हुआ
हारना था एक को
तुम ही सही
एक कोशिश और हो
नए संदर्भों में
क्या पता तुम विजित हो
आख़िर भवितव्यता है
हाथ उसके
क्या पता तुम पा सको
सत्य अपने
खोजना तो सबको पड़ा है
रास्ता उस छोर का
मंजिलें आकर सभी
ख़त्म हो जाती जंहाँ
और है प्रारम्भ जिसपर
अनंत का वैभव निरंतर
धड़कनें कहतीं जहाँ हैं -
सत्य है केवल समर्पण .
बुद्धिजीवी भडुआ
अस्तित्व की सारी लडाई
रहें कैसे बनकर इकाई
सोचता हर मूढ़
देता स्वप्न की पागल दुहाई
स्वार्थ जिसका आत्मसीमित
कर रहा है बेहयाई
वासनाओं के लिए
वह ढूंढता है तर्क कोई
और उसको फेंककर वह मुस्कुराता
नही जिसमे शर्म कोई
ढोंग उसका है उसे भी सालता
यत्किंचित कभी
पर बुद्धिजीवी भडुआ बना वह
सोचता मैं हूँ सही
भूलता सम्बन्ध सारे
आत्मीयता मारकर
कर रहा दुष्कर्म सारे
नित धर्म को वह त्यागकर
कौन समझाए उसे
वह अनसुना है कर रहा
आत्मचेतस भाव को जो
मारकर है जी रहा .
रहें कैसे बनकर इकाई
सोचता हर मूढ़
देता स्वप्न की पागल दुहाई
स्वार्थ जिसका आत्मसीमित
कर रहा है बेहयाई
वासनाओं के लिए
वह ढूंढता है तर्क कोई
और उसको फेंककर वह मुस्कुराता
नही जिसमे शर्म कोई
ढोंग उसका है उसे भी सालता
यत्किंचित कभी
पर बुद्धिजीवी भडुआ बना वह
सोचता मैं हूँ सही
भूलता सम्बन्ध सारे
आत्मीयता मारकर
कर रहा दुष्कर्म सारे
नित धर्म को वह त्यागकर
कौन समझाए उसे
वह अनसुना है कर रहा
आत्मचेतस भाव को जो
मारकर है जी रहा .
Saturday, August 9, 2008
जाने क्यों
जाने क्यों
विश्वास नही होता
जो गुज़र गया
वह अतीत केवल भ्रम था
वह सम्बन्ध आत्मीय सा
जो हममे तुममे था
वो महज़ एक सपना था
तुम भूल गए मुझको
मैं तुम्हे भुला न पाया
शायद इसीलिए कि
जो जीवित है मुझमे अभी तलक
वो तुममे था कभी
बहुत निकट से पाया .
विश्वास नही होता
जो गुज़र गया
वह अतीत केवल भ्रम था
वह सम्बन्ध आत्मीय सा
जो हममे तुममे था
वो महज़ एक सपना था
तुम भूल गए मुझको
मैं तुम्हे भुला न पाया
शायद इसीलिए कि
जो जीवित है मुझमे अभी तलक
वो तुममे था कभी
बहुत निकट से पाया .
तुम्हारे आघात सहकर
तुम्हारे आघात सहकर
आंसू गिर नही पाये
शिलाओं पर उकेरे चित्र
जो यह कह नही पाये
कि-
वह शिल्पी नही था
जिसने मुझे निर्मित किया
मैं अभिव्यक्ति हूँ
इस शिला की
जिसने मुझे पैदा किया
तुम्हारे आघात सहकर .
आंसू गिर नही पाये
शिलाओं पर उकेरे चित्र
जो यह कह नही पाये
कि-
वह शिल्पी नही था
जिसने मुझे निर्मित किया
मैं अभिव्यक्ति हूँ
इस शिला की
जिसने मुझे पैदा किया
तुम्हारे आघात सहकर .
रूपगर्विता
अनाम !
तुम फ़िर रूठ गए
बिना ये कहे कि
मेरी भूल क्या है ?
और मैं ........
मैं खोजा करता हूँ
उस कारण को
जो दरार बना है
हमारे बीच की जमीन में
कदम बढ़ाकर कई बार चाहा कि
लाँघ जाऊं वह दरार
लेकिन पता नही क्यों
मुझे लगता है
ऐसा करने में
तुम दोषी मुझे ही ठहराओगे
अपने रूठ जाने का
और फ़िर मैं
इंतज़ार करने लगता हूँ
ये सोचकर कि शायद
तुम ही मान जाओ या फ़िर
कारण दे जाओ
अपने रूठने का
मगर तुम्हारी खामोशी भी अजीब है
जो टूटती ही नही
हर बार मैं ही
पराजित-सा
विवश-सा
आ जाता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हे मनाने
अनाम !
इस बार ऐसा नही होगा
मैं अपने प्यार को
लाचार नही करूंगा
और न ही बनाऊंगा उसे -जरूरत
रहने दो खामोश
हमारे बीच के संवाद को
बढ़ती है तो बढ़ जाने दो
हमारे बीच इस दरार को
अपने ही अस्तित्व में
वो सब कुछ
जो तुममे चाहा-पा लूँगा
अतीत की स्मृतियों में झाँककर
ख़ुद को अपने ही प्यार से-भर लूँगा
जो मेरे अहम् का
एक टूटा हुआ हिस्सा है
और तुम्हारे अहम् में
जुडा एक किस्सा है .
तुम फ़िर रूठ गए
बिना ये कहे कि
मेरी भूल क्या है ?
और मैं ........
मैं खोजा करता हूँ
उस कारण को
जो दरार बना है
हमारे बीच की जमीन में
कदम बढ़ाकर कई बार चाहा कि
लाँघ जाऊं वह दरार
लेकिन पता नही क्यों
मुझे लगता है
ऐसा करने में
तुम दोषी मुझे ही ठहराओगे
अपने रूठ जाने का
और फ़िर मैं
इंतज़ार करने लगता हूँ
ये सोचकर कि शायद
तुम ही मान जाओ या फ़िर
कारण दे जाओ
अपने रूठने का
मगर तुम्हारी खामोशी भी अजीब है
जो टूटती ही नही
हर बार मैं ही
पराजित-सा
विवश-सा
आ जाता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हे मनाने
अनाम !
इस बार ऐसा नही होगा
मैं अपने प्यार को
लाचार नही करूंगा
और न ही बनाऊंगा उसे -जरूरत
रहने दो खामोश
हमारे बीच के संवाद को
बढ़ती है तो बढ़ जाने दो
हमारे बीच इस दरार को
अपने ही अस्तित्व में
वो सब कुछ
जो तुममे चाहा-पा लूँगा
अतीत की स्मृतियों में झाँककर
ख़ुद को अपने ही प्यार से-भर लूँगा
जो मेरे अहम् का
एक टूटा हुआ हिस्सा है
और तुम्हारे अहम् में
जुडा एक किस्सा है .
Saturday, June 28, 2008
बदलते शब्द
ये शब्द भी अजीब आदमी होते हैं
पता नही क्यों
अपनी मासूम अर्थवत्ता को छोड़
ऐठें-ऐठें से रहते हैं
खोखले ,बेजान बिल्कुल बेसुरे से
दौड़े-दौड़े से फिरते हैं
अक्सर टकरा जाते हैं मुझसे
मैं इन्हे पहचानने की कोशिश करता हूँ
हाथ बढ़ाता हूँ
ये हाथ मिलाने से इन्कार कर देते हैं
एक दिन
बेहद आत्मीय सा लगने वाला
शब्द - प्रेम मिला
मैंने चाह गले लगा लूँ
मगर ये क्या !!
इसमें जो भी अच्छा था
मेरे अनुभव से सच्चा था
वो बदल गया था
जब मैंने बात करनी चाही तो
वह स्वार्थ में खो गया था
मैंने पूछा -
तुम्हारा साथी विश्वास कहाँ है ?
उसने चौंक कर कहा -
अरे वो !
वो तो आउट डेटेड हो चुका है
पुराने पीपल के पास
एक झोपड़ी में बीमार-सा रहता है
उसकी जगह मैंने
अपनी कंपनी में
शक को अपोइन्ट कर लिया है
मैं समझ गया
प्रेम भी स्वार्थ के वशीभूत हो
छला गया
तभी मेरे पास
मेरा पुराना मित्र अनुभव
दौड़ा-दौड़ा आया
कहने लगा -
क्यों बंधुवर !
किस सोच में पड़ गए
मैंने जो कुछ भी
अब तक तुम्हे दिखाया
उसे एक दम ही भूल गए
परेशां मत हो
इसके बदल जाने में
इसका दोष नही
दोष है उन चंद लोगों का
जो इसकी चर्चा करते हैं
लेकिन इसका साथ नही देते
तभी तो -
अकेला पड़ गया है
अर्थवत्ता से शब्द का
तलाक हो गया है
विश्वास जो था साथी
वो भी दूर हो गया है
फ़िर मैं ...
अपने मित्र अनुभव के साथ
देर रात तक शहर में घूमता रहा
बहुत पुराने अच्छे शब्दों से मिलता रहा
लेकिन ........
सभी बदल चुके थे
अनुभव ने कहा -
मित्र !तुम अब तक छले गए थे .
पता नही क्यों
अपनी मासूम अर्थवत्ता को छोड़
ऐठें-ऐठें से रहते हैं
खोखले ,बेजान बिल्कुल बेसुरे से
दौड़े-दौड़े से फिरते हैं
अक्सर टकरा जाते हैं मुझसे
मैं इन्हे पहचानने की कोशिश करता हूँ
हाथ बढ़ाता हूँ
ये हाथ मिलाने से इन्कार कर देते हैं
एक दिन
बेहद आत्मीय सा लगने वाला
शब्द - प्रेम मिला
मैंने चाह गले लगा लूँ
मगर ये क्या !!
इसमें जो भी अच्छा था
मेरे अनुभव से सच्चा था
वो बदल गया था
जब मैंने बात करनी चाही तो
वह स्वार्थ में खो गया था
मैंने पूछा -
तुम्हारा साथी विश्वास कहाँ है ?
उसने चौंक कर कहा -
अरे वो !
वो तो आउट डेटेड हो चुका है
पुराने पीपल के पास
एक झोपड़ी में बीमार-सा रहता है
उसकी जगह मैंने
अपनी कंपनी में
शक को अपोइन्ट कर लिया है
मैं समझ गया
प्रेम भी स्वार्थ के वशीभूत हो
छला गया
तभी मेरे पास
मेरा पुराना मित्र अनुभव
दौड़ा-दौड़ा आया
कहने लगा -
क्यों बंधुवर !
किस सोच में पड़ गए
मैंने जो कुछ भी
अब तक तुम्हे दिखाया
उसे एक दम ही भूल गए
परेशां मत हो
इसके बदल जाने में
इसका दोष नही
दोष है उन चंद लोगों का
जो इसकी चर्चा करते हैं
लेकिन इसका साथ नही देते
तभी तो -
अकेला पड़ गया है
अर्थवत्ता से शब्द का
तलाक हो गया है
विश्वास जो था साथी
वो भी दूर हो गया है
फ़िर मैं ...
अपने मित्र अनुभव के साथ
देर रात तक शहर में घूमता रहा
बहुत पुराने अच्छे शब्दों से मिलता रहा
लेकिन ........
सभी बदल चुके थे
अनुभव ने कहा -
मित्र !तुम अब तक छले गए थे .
Tuesday, June 24, 2008
भवितव्यता
उसने
मौसमों की बातें करनी छोड़ दी
क्योंकि -
वो बदल जाते हैं
उसने
लोगों की बातें करनी छोड़ दी
क्योंकि -
वो बदल जाते हैं
अब वो खामोश रहता है
देखते हुए -
सागर की लहरों को
आती-जाती बहारों को
खिलते हुए फूलों को
गाते हुए भौरों को
अब उसे लगता है
चर्चाएँ बेकार है
सब कुछ कह चुकने के बाद भी
बहुत कुछ रह जाता है
जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है
समय की धारा में रहकर
अस्तित्व की भवितव्यता को जानकर .
मौसमों की बातें करनी छोड़ दी
क्योंकि -
वो बदल जाते हैं
उसने
लोगों की बातें करनी छोड़ दी
क्योंकि -
वो बदल जाते हैं
अब वो खामोश रहता है
देखते हुए -
सागर की लहरों को
आती-जाती बहारों को
खिलते हुए फूलों को
गाते हुए भौरों को
अब उसे लगता है
चर्चाएँ बेकार है
सब कुछ कह चुकने के बाद भी
बहुत कुछ रह जाता है
जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है
समय की धारा में रहकर
अस्तित्व की भवितव्यता को जानकर .
Saturday, June 21, 2008
संशय
अब मुझे भय लगता है
हर उस ज़ज्बात से
जिसमें प्यार है ,विश्वास है
क्योंकि -
दोनों ही टूटे हैं
बड़ी निर्दयता से हत्या कर दी गई
उस मासूम बच्चे की
जो हँस सकता था
दूसरों को खुशियाँ दे सकता था
हाँ ! मैं भी रोया था
उसके कत्ल के बाद
और वो सभी
जो प्रेम करना जानते थे
जो विश्वास करना जानते थे
क्योंकि -
वो मासूम बच्चा हमारा
अभिन्न अंग था
इस विलाप पर
वो हँसा था
जिसमें हृदय नही था
जो मुखौटे लगाना जानता था
तभी शायद ,
मुखौटा बदलकर बोला था
आबादी बढ़ने न पाए इंसानों की
जो प्यार कर सकते हैं
उसे भय था कि
लोग विश्वास पर जी सकते हैं
तभी से मुझे भय लगता है
हर एक पर शक सा होता है
कि जैसे -
सब अभिनय कर रहे हों
मंच पर आकर
अलग-अलग मुखौटे पहनकर
कि जैसे -
वो यकीन खो चुकने के बाद भी
यकीन दिलाना चाहते हों
एक जादूगर की तरह
पल भर में मुझे
हवा पर लिटा देंगें
बस एक बार ऑंखें बंद कर दूँ
सदा के लिए सुला देंगे
लेकिन -
मेरी भी जिद है
आख़िर मैं क्यों शक करना छोड़ दूँ
जबकि -
दोनों ही टूटे हैं
-प्यार भी
-विश्वास भी .
हर उस ज़ज्बात से
जिसमें प्यार है ,विश्वास है
क्योंकि -
दोनों ही टूटे हैं
बड़ी निर्दयता से हत्या कर दी गई
उस मासूम बच्चे की
जो हँस सकता था
दूसरों को खुशियाँ दे सकता था
हाँ ! मैं भी रोया था
उसके कत्ल के बाद
और वो सभी
जो प्रेम करना जानते थे
जो विश्वास करना जानते थे
क्योंकि -
वो मासूम बच्चा हमारा
अभिन्न अंग था
इस विलाप पर
वो हँसा था
जिसमें हृदय नही था
जो मुखौटे लगाना जानता था
तभी शायद ,
मुखौटा बदलकर बोला था
आबादी बढ़ने न पाए इंसानों की
जो प्यार कर सकते हैं
उसे भय था कि
लोग विश्वास पर जी सकते हैं
तभी से मुझे भय लगता है
हर एक पर शक सा होता है
कि जैसे -
सब अभिनय कर रहे हों
मंच पर आकर
अलग-अलग मुखौटे पहनकर
कि जैसे -
वो यकीन खो चुकने के बाद भी
यकीन दिलाना चाहते हों
एक जादूगर की तरह
पल भर में मुझे
हवा पर लिटा देंगें
बस एक बार ऑंखें बंद कर दूँ
सदा के लिए सुला देंगे
लेकिन -
मेरी भी जिद है
आख़िर मैं क्यों शक करना छोड़ दूँ
जबकि -
दोनों ही टूटे हैं
-प्यार भी
-विश्वास भी .
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