नए वर्ष में नई नई ज्योति से
नव प्रकाश हो धरती पर
हर्षित हो संसार-सकल
कलुषित तम को क्षीणित कर
हम चलें निरंतर उन्नति पथ पर
करते जयघोष दिशाओं में
पायें सब अपने आशय को
प्रत्येक विषम दशाओं में ।
नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं......
Saturday, January 3, 2009
Wednesday, December 24, 2008
मन
इस प्रकम्पित चित्त का चिंतन
कितना अधूरा है ?
व्योम सा विस्तार जीवन का
अलग अनुभव सभी का
हमारी मान्यताएं और उनका टूटना
कितना अधूरा है ?
नही ये जानता मन कि
सपने झूठ क्यों होते ?
और जो है सच
वही परिणाम ढोना
क्यों जरूरी है ?
कितना अधूरा है ?
व्योम सा विस्तार जीवन का
अलग अनुभव सभी का
हमारी मान्यताएं और उनका टूटना
कितना अधूरा है ?
नही ये जानता मन कि
सपने झूठ क्यों होते ?
और जो है सच
वही परिणाम ढोना
क्यों जरूरी है ?
Saturday, December 20, 2008
प्रेम-बोध
जब मेरा प्यार
तुम्हारे लिए
अहंकार का कारण बना
और तुम्हारे द्वारा दिया तिरस्कार
मेरे आत्मबोध का ;
मैंने तुम्हे धन्यवाद दिया
ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर
और खुश हुआ
ईश्वरीय प्रेम पाकर .
तुम्हारे लिए
अहंकार का कारण बना
और तुम्हारे द्वारा दिया तिरस्कार
मेरे आत्मबोध का ;
मैंने तुम्हे धन्यवाद दिया
ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर
और खुश हुआ
ईश्वरीय प्रेम पाकर .
Friday, November 14, 2008
हर क्षण सुख है
मैंने कहा -
क्या मेरे दुःख का अंत है ?
उसने पूछा -
क्या सुख का अंत चाहते हो ?
मैंने कहा -
नही
सुख पाना चाहता हूँ
उसने कहा -
तो दुःख के लिए तैयार रहो
तुम्हारा चाहना ही दुःख है
बाकी हर क्षण सुख है .
क्या मेरे दुःख का अंत है ?
उसने पूछा -
क्या सुख का अंत चाहते हो ?
मैंने कहा -
नही
सुख पाना चाहता हूँ
उसने कहा -
तो दुःख के लिए तैयार रहो
तुम्हारा चाहना ही दुःख है
बाकी हर क्षण सुख है .
Saturday, November 8, 2008
फ़िर से आई याद .....
बहुत दिनों के बाद
तुम्हारी फ़िर से आई याद
मचल उठा जी मिलने को
पर हार गई है आस
हार गई है आस
कहाँ से लाऊं फ़िर विश्वास
मूक धरा आकाश चराचर
मिटे कहाँ से प्यास
मिटे कहाँ से प्यास
मेरा मन हैं बहुत उदास
कि तुम नही हमारे पास
अब टूट रही है आस
बहुत दिनों के बाद
तुम्हारी फ़िर से आई याद .......
तुम्हारी फ़िर से आई याद
मचल उठा जी मिलने को
पर हार गई है आस
हार गई है आस
कहाँ से लाऊं फ़िर विश्वास
मूक धरा आकाश चराचर
मिटे कहाँ से प्यास
मिटे कहाँ से प्यास
मेरा मन हैं बहुत उदास
कि तुम नही हमारे पास
अब टूट रही है आस
बहुत दिनों के बाद
तुम्हारी फ़िर से आई याद .......
Saturday, November 1, 2008
दोस्ती निभती नही
सच कहा -
मुझसे दोस्ती निभती नही
निभे भी कैसे ?
तुम्हारे सतत आघात को
मैं सह नही पाता
अपनी पीड़ा को हँसकर
छुपा नही पाता
आत्मीयता के विस्तार में
सीमा रेखाएं ख्नीच नही पाता
दोस्ती के फासले जान नही पाता
अपनी परम अभिव्यक्ति रोक नही पाता
दोस्ती निभे भी कैसे
जब मेरी विनम्रता
तुम्हारे अहम् की पोषक बन जाए
तुम्हारी हँसी
मेरे हृदय पर कटाक्ष कर जाए
मेरा प्यार
तुम्हारे गर्व का हास बन जाए
दोस्ती निभे भी कैसे
जब मैं झूठ तुमसे कह नही पाता
तुम्हारा पतन सह नही पाता
वह जाल जिसमें आदमी फंसते हैं
बुन नही पाता .
मुझसे दोस्ती निभती नही
निभे भी कैसे ?
तुम्हारे सतत आघात को
मैं सह नही पाता
अपनी पीड़ा को हँसकर
छुपा नही पाता
आत्मीयता के विस्तार में
सीमा रेखाएं ख्नीच नही पाता
दोस्ती के फासले जान नही पाता
अपनी परम अभिव्यक्ति रोक नही पाता
दोस्ती निभे भी कैसे
जब मेरी विनम्रता
तुम्हारे अहम् की पोषक बन जाए
तुम्हारी हँसी
मेरे हृदय पर कटाक्ष कर जाए
मेरा प्यार
तुम्हारे गर्व का हास बन जाए
दोस्ती निभे भी कैसे
जब मैं झूठ तुमसे कह नही पाता
तुम्हारा पतन सह नही पाता
वह जाल जिसमें आदमी फंसते हैं
बुन नही पाता .
Friday, October 24, 2008
क्षणिकाएं
अब तू नही तो क्या हुआ
ये फूल हैं ,ये रंग हैं
मैं तुझे ही देखता हूँ
ये आइने,ये दर्द हैं ।
* * * * * * * * * *
मेरे हर अश्क एक कहानी हैं
जिसे तुम कहते हो की एक पानी है
अपना साया देख सकते हो इसमें
मेरे अश्कों में तुम्हारी भी कहानी है
* * * * * * * * * * * * * * * * *
तुम्हारे इश्क का वो नूर है
जो दिख रहा चेहरे पर मेरे
लोग अक्सर पूछते हैं -
कौन थी वो ?
* * * * * * * * * * *
सागर की लहरों को गिनना
मेरी आदत पहले न थी
कुछ भी देखूं तुमको देखूं
ऐसी आदत पहले न थी
* * * * * * * * * * *
चट्टानों से टकराकर भी
लहरें हार नहीं मानतीं
प्यार एक पागलपन हैं
बुद्धि भला कब इसे आंकती ?
* * * * * * * * * * * * *
अपना सोचा कब होता है
नियति नटी पर मन रोता है
जग सारा जब सो जाता है
असमान तब क्यों रोता है ?
* * * * * * * * * * * * * *
मन्दिर में जा कर मैंने
कभी नही वरदान है माँगा
तेरे चरणों में शीश झुकाकर
यही कहा -"तुम भूल न जाना "
* * * * * * * * * * * * * * * *
ओस से भीगी हुयी
कंपती कली गुलाब की
जिंदगी कुछ इस तरह है
प्यार की और ख्वाब की
* * * * * * * * * * * * *
कौन जाने प्यार क्या है
जब समर्पण मौन है
कह नही सकता जगत में
क्या मौन सचमुच मौन है ?
* * * * * * * * * * * * * * * *
संकोचों के पाटों में पिसती इच्छा
अब शाम हो गई
कह न पाए जो कहना था
तनहाई अब आम हो गई
* * * * * * * * * * * * * * * * *
फूल का झरना नही इतिहास होता
समृद्धि के आगार पर दुःख का नही एहसास होता
है अगर तुममें कहीं विश्वास तो
तुम प्यार कर लो
ईश का वरदान कब अभिशाप होता ?
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
किसकी तलाश में हम
राह ये हैं तकते
डूबे हैं कई मंज़र
टूटे हैं कई सपने
* * * * * * * * * * * *
बस यूँ ही कह कर तुमने
मुझको अर्थ दे दिए कितने
सुलझाने में जिसको मैंने
दर्द बुन लिए कितने
* * * * * * * * * * * * * *
शमा को पतंगे से
भला कब प्यार होता है
बड़ा मासूम आशिक है
जो जल के खाक होता है ।
ये फूल हैं ,ये रंग हैं
मैं तुझे ही देखता हूँ
ये आइने,ये दर्द हैं ।
* * * * * * * * * *
मेरे हर अश्क एक कहानी हैं
जिसे तुम कहते हो की एक पानी है
अपना साया देख सकते हो इसमें
मेरे अश्कों में तुम्हारी भी कहानी है
* * * * * * * * * * * * * * * * *
तुम्हारे इश्क का वो नूर है
जो दिख रहा चेहरे पर मेरे
लोग अक्सर पूछते हैं -
कौन थी वो ?
* * * * * * * * * * *
सागर की लहरों को गिनना
मेरी आदत पहले न थी
कुछ भी देखूं तुमको देखूं
ऐसी आदत पहले न थी
* * * * * * * * * * *
चट्टानों से टकराकर भी
लहरें हार नहीं मानतीं
प्यार एक पागलपन हैं
बुद्धि भला कब इसे आंकती ?
* * * * * * * * * * * * *
अपना सोचा कब होता है
नियति नटी पर मन रोता है
जग सारा जब सो जाता है
असमान तब क्यों रोता है ?
* * * * * * * * * * * * * *
मन्दिर में जा कर मैंने
कभी नही वरदान है माँगा
तेरे चरणों में शीश झुकाकर
यही कहा -"तुम भूल न जाना "
* * * * * * * * * * * * * * * *
ओस से भीगी हुयी
कंपती कली गुलाब की
जिंदगी कुछ इस तरह है
प्यार की और ख्वाब की
* * * * * * * * * * * * *
कौन जाने प्यार क्या है
जब समर्पण मौन है
कह नही सकता जगत में
क्या मौन सचमुच मौन है ?
* * * * * * * * * * * * * * * *
संकोचों के पाटों में पिसती इच्छा
अब शाम हो गई
कह न पाए जो कहना था
तनहाई अब आम हो गई
* * * * * * * * * * * * * * * * *
फूल का झरना नही इतिहास होता
समृद्धि के आगार पर दुःख का नही एहसास होता
है अगर तुममें कहीं विश्वास तो
तुम प्यार कर लो
ईश का वरदान कब अभिशाप होता ?
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
किसकी तलाश में हम
राह ये हैं तकते
डूबे हैं कई मंज़र
टूटे हैं कई सपने
* * * * * * * * * * * *
बस यूँ ही कह कर तुमने
मुझको अर्थ दे दिए कितने
सुलझाने में जिसको मैंने
दर्द बुन लिए कितने
* * * * * * * * * * * * * *
शमा को पतंगे से
भला कब प्यार होता है
बड़ा मासूम आशिक है
जो जल के खाक होता है ।
Sunday, October 12, 2008
कृतज्ञता
कितना हर्षित कर जाते हो
प्रिय तुम प्यार लुटाकर
कितने फूल बिछा जाते हो
पथ से कांटे उठा-उठाकर
कहूँ कहाँ तक प्रेम तुम्हारा
जो निस्सीम गगन सा है
पार न जा पाता मैं उसके
वह अनंत -अगम-सा है
हर सुबह नई किरणे देकर
तुम हर लेते हो मेरी पीड़ा
फ़िर सांध्य समय अंतस में आकर
झंकृत करते हो अन्तर वीणा
हर क्षण तुम अपनी कोरों से
संसार सकल को बदल रहे
मेरे गीतों मेरी थिरकन में
तुम ही हो जो मचल रहे
हर सबनम का कतरा-कतरा
मेरे दुखों का निष्कासन है
तुम उन्हें उठाकर हाथों से
जो देते हो वो दर्शन है
फ़िर हास्य मिले या दुःख भाई
वो शून्य शान्ति में खो जाता है
मैं भेद नही कर पाता हूँ
यही तुम्हारी समरसता है
हूँ कृतज्ञ पूर्ण तुमसे मैं प्रियतम !
जो जीवन संगीत मुझे हो देते
मैं जीता हूँ बस उन्हीं क्षणों में
जिनमें तुम मुझसे हो मिलते .
प्रिय तुम प्यार लुटाकर
कितने फूल बिछा जाते हो
पथ से कांटे उठा-उठाकर
कहूँ कहाँ तक प्रेम तुम्हारा
जो निस्सीम गगन सा है
पार न जा पाता मैं उसके
वह अनंत -अगम-सा है
हर सुबह नई किरणे देकर
तुम हर लेते हो मेरी पीड़ा
फ़िर सांध्य समय अंतस में आकर
झंकृत करते हो अन्तर वीणा
हर क्षण तुम अपनी कोरों से
संसार सकल को बदल रहे
मेरे गीतों मेरी थिरकन में
तुम ही हो जो मचल रहे
हर सबनम का कतरा-कतरा
मेरे दुखों का निष्कासन है
तुम उन्हें उठाकर हाथों से
जो देते हो वो दर्शन है
फ़िर हास्य मिले या दुःख भाई
वो शून्य शान्ति में खो जाता है
मैं भेद नही कर पाता हूँ
यही तुम्हारी समरसता है
हूँ कृतज्ञ पूर्ण तुमसे मैं प्रियतम !
जो जीवन संगीत मुझे हो देते
मैं जीता हूँ बस उन्हीं क्षणों में
जिनमें तुम मुझसे हो मिलते .
Wednesday, October 8, 2008
याद तुम्हे किसकी आती ?
रिमझिम रिमझिम झिमझिम झिमझिम
बरस रही जल धार यहाँ पर
भीनी-भीनी खुशबू उठती
बहती बसंत बयार यहाँ पर
झूम रहे हैं तरु पुलकित सब
कोयल मधुरिम गीत सुनाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
वर्षा की बूंदे हैं झरती
पायल के घुँघरू सी छुन-छुन
मन मेरा कहता प्रिय आओ
अंक मुझे ले तुम सो जाओ
हा ! पलकें मेरी झुक जातीं
सिहरन सी तन में उठ जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
इस उपवन के एकांत भवन में
बैठी हूँ वीणा सम्मुख
तुम आ जाते मैं छू तारों को
आज नया एक गीत सुनाती
पर हाय ! अकेली मैं चुनती हूँ
सपनों के सुंदर मोती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
जीवन ही संताप बना है
प्रेम यहाँ अभिशाप बना है
कौन जिए किसकी खातिर
अखिल विश्व ही त्रास बना है
विरह जन्य पीड़ा क्या होती
काश ! कि तुमको बतला सकती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
एक अनाम अतृप्त इच्छा सी
जीवन की सुधियाँ कुछ विष सी
दुविधा संभ्रम की विचलित करती
हत आहत मैं क्रंदन करती
फ़िर सुधियों की मदिरा पीकर
बेसुध जग से हो जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
मौसम दिलकश उस दिन था
मौसम दिलकश अब भी है
फ़िर भी लगता जीवन सूना
जैसे टूटा कोई सपना
मना रही जो रूठा अपना
मेरी कोशिश असफल जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
बरस रही जल धार यहाँ पर
भीनी-भीनी खुशबू उठती
बहती बसंत बयार यहाँ पर
झूम रहे हैं तरु पुलकित सब
कोयल मधुरिम गीत सुनाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
वर्षा की बूंदे हैं झरती
पायल के घुँघरू सी छुन-छुन
मन मेरा कहता प्रिय आओ
अंक मुझे ले तुम सो जाओ
हा ! पलकें मेरी झुक जातीं
सिहरन सी तन में उठ जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
इस उपवन के एकांत भवन में
बैठी हूँ वीणा सम्मुख
तुम आ जाते मैं छू तारों को
आज नया एक गीत सुनाती
पर हाय ! अकेली मैं चुनती हूँ
सपनों के सुंदर मोती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
जीवन ही संताप बना है
प्रेम यहाँ अभिशाप बना है
कौन जिए किसकी खातिर
अखिल विश्व ही त्रास बना है
विरह जन्य पीड़ा क्या होती
काश ! कि तुमको बतला सकती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
एक अनाम अतृप्त इच्छा सी
जीवन की सुधियाँ कुछ विष सी
दुविधा संभ्रम की विचलित करती
हत आहत मैं क्रंदन करती
फ़िर सुधियों की मदिरा पीकर
बेसुध जग से हो जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
मौसम दिलकश उस दिन था
मौसम दिलकश अब भी है
फ़िर भी लगता जीवन सूना
जैसे टूटा कोई सपना
मना रही जो रूठा अपना
मेरी कोशिश असफल जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?
Saturday, September 27, 2008
आकांक्षा
तुम आक़र मेरे जीवन में
यूँ ही एक स्वर बन जाया करो
अधरों से मेरे गीत उठें तो
उनमें तुम मिल जाया करो
चंदन की खुशबू हो तुम
या रजनीगंधा फूल कोई
सुरभित कर जाती हो मुझको
तुम यूँ ही प्रसारित हुआ करो
जीवन-मरू की जलधार हो तुम
मेरे सपनों का साकार हो तुम
जो छू जाए मेरे मन को
ऐसी सुंदर मुस्कान हो तुम
मेरे नीरव से जीवन में तुम
कलरव बनकर यूँ हँसा करो
जब मैं चातक सा तृषित बनूँ
तुम स्वाति बूँद बन जाया करो
पतझड़ तो आए हरदम ही
मेरे जीवन के सांद्य समय
तुम उसमें भी बन दीप कोई
मेरा पथ आलोकित किया करो
तुम सजल करो मेरे नयनों को
दो अश्रु धार बह जाने दो
भर सकूं हृदय को भावों से
ऐसा अतुलित तुम प्यार करो
तुम हो अंतस का प्रपन्न भाव
झंकृत वीणा को किया करो
मेरी स्वर लहरी गूँज उठे
आशीष प्रेम का दिया करो .
यूँ ही एक स्वर बन जाया करो
अधरों से मेरे गीत उठें तो
उनमें तुम मिल जाया करो
चंदन की खुशबू हो तुम
या रजनीगंधा फूल कोई
सुरभित कर जाती हो मुझको
तुम यूँ ही प्रसारित हुआ करो
जीवन-मरू की जलधार हो तुम
मेरे सपनों का साकार हो तुम
जो छू जाए मेरे मन को
ऐसी सुंदर मुस्कान हो तुम
मेरे नीरव से जीवन में तुम
कलरव बनकर यूँ हँसा करो
जब मैं चातक सा तृषित बनूँ
तुम स्वाति बूँद बन जाया करो
पतझड़ तो आए हरदम ही
मेरे जीवन के सांद्य समय
तुम उसमें भी बन दीप कोई
मेरा पथ आलोकित किया करो
तुम सजल करो मेरे नयनों को
दो अश्रु धार बह जाने दो
भर सकूं हृदय को भावों से
ऐसा अतुलित तुम प्यार करो
तुम हो अंतस का प्रपन्न भाव
झंकृत वीणा को किया करो
मेरी स्वर लहरी गूँज उठे
आशीष प्रेम का दिया करो .
Saturday, September 13, 2008
अद्वैत
अंधकार में आहट आती
बार-बार नीरव को चीर
कर जाती संतप्त हृदय को
दे जाती कलुषित सी पीर
कहते थे तुम उसकी संसृति
वो है जग का रचनाकार
पर ये त्रैताप जगत में इतना
क्यों करता है हाहाकार
फैला है उसके जग में क्यों
यह अशांत सा पापाचार
क्यों जग सारा मदिरा में डूबा
कर रहा निरंतर चीत्कार
कहते थे तुम वह है
सर्वज्ञ और अंतर्यामी
फ़िर बोलो क्या न समझ सका
इस जग की सिहरन खल-कामी
मेरे अन्तर की ज्वाला भी
देखो कितनी है धधक रही
कर रही तुम्हारे प्रियतम से
संवाद मौन में भभक रही
मैं नही मानता वह जग का
हो सकता है निर्माता
जिसको कहते तुम खेल-खेल में
यह जग सारा रच डाला
जब एक मनुष्य तृष्णा में पड़कर
पापी हो सकता है
तो इस तृष्णामय जग का वह निर्माता
कैसे बच सकता है
बंधे हुए से भटक रहे हैं
नक्षत्र और ग्रह तारे सारे
कहाँ स्वतंत्रता फ़िर जगती में
फिरते हैं मारे-मारे
ओ मेरे सूनेपन के साथी !
तुम भी कितने छलिया हो
रहकर साथ सदा ही मेरे
करते बातें उसकी हो
आओ आज तुम्हारे
सारे भ्रम को मैं क्षीदित कर दूँ
व्यक्ति रूप में कहीं नही है
तेरा प्रियतम तुझसे कह दूँ
वह तो है चेतनता
इस अखिल ब्रह्माण्ड शाश्वत में
फिर संदर्भित क्या रह जाता है
जड़ या चेतन में ?
मैं हूँ ,तुम हो और प्रकृति
ये भ्रम है मन की चंचलता
एक वही है और न दूजा
समझो छोडो सब पंकलता
दुःख -सुख तो प्रतीति हैं मन की
कष्ट सभी इस तन के हैं
वह एक सदा ही निस्पृह है
प्रज्ञा बोध उसी के हैं
यह प्रपंच जो दीख रहा है
उसको तुम माया कह लो
वर्तमान क्षण आनंद भरा है
चिंता को दुःख कह लो
गतिमय है ब्रह्माण्ड सकल
चेतनता है भरी हुयी
कर्तत्व भाव को छोडो
देखो कर्ता है कहीं नही
नदियाँ गिरि से निकल निकलकर
दौडी जाती हैं सागर की ओर
बादल भी जल लेकर देखो
है भिगो रहा संसार छोर
मधुपों ने गुंजार किया
कलियों ने श्रृंगार किया
पर कहीं नही कोई कहता
हमने ये कर्म विशेष किया
पंछी गाते वृक्ष उग रहे
कलियाँ खिलती रहती हैं
धूप खिल रही,रात्रि जा रही
ऋतुएं बदला करती हैं
बजती है अनहद नाद कहीं
खिलती है करुणा की मुस्कान
सुधा छलकती पूरित करती
लो ! आ गए हमारे प्रियतम प्राण
अब तक मैं था , अब कहीं नही हूँ
सर्वस्व स्वतः खो जाता है
कैसे कहूं उस अनंत भाव को
कहने वाला खो जाता है
बिखर पड़ रहे शब्द मेरे
फ़िर भी तुम कहते हो बोलो
तो आओ अंतस में मेरे
देखो उसको तुम भी ले लो
पाकर मैं हूँ धन्य उसे
अब कही नही है जाना
जान चुका कैसे झूठा है
जगती का सब ताना-बाना
बस ! अब और नही कह सकता
वह अनंत है शब्द परे
अनुभूति सदा एकाकी है
वह चर्चाओं से सदा परे .
बार-बार नीरव को चीर
कर जाती संतप्त हृदय को
दे जाती कलुषित सी पीर
कहते थे तुम उसकी संसृति
वो है जग का रचनाकार
पर ये त्रैताप जगत में इतना
क्यों करता है हाहाकार
फैला है उसके जग में क्यों
यह अशांत सा पापाचार
क्यों जग सारा मदिरा में डूबा
कर रहा निरंतर चीत्कार
कहते थे तुम वह है
सर्वज्ञ और अंतर्यामी
फ़िर बोलो क्या न समझ सका
इस जग की सिहरन खल-कामी
मेरे अन्तर की ज्वाला भी
देखो कितनी है धधक रही
कर रही तुम्हारे प्रियतम से
संवाद मौन में भभक रही
मैं नही मानता वह जग का
हो सकता है निर्माता
जिसको कहते तुम खेल-खेल में
यह जग सारा रच डाला
जब एक मनुष्य तृष्णा में पड़कर
पापी हो सकता है
तो इस तृष्णामय जग का वह निर्माता
कैसे बच सकता है
बंधे हुए से भटक रहे हैं
नक्षत्र और ग्रह तारे सारे
कहाँ स्वतंत्रता फ़िर जगती में
फिरते हैं मारे-मारे
ओ मेरे सूनेपन के साथी !
तुम भी कितने छलिया हो
रहकर साथ सदा ही मेरे
करते बातें उसकी हो
आओ आज तुम्हारे
सारे भ्रम को मैं क्षीदित कर दूँ
व्यक्ति रूप में कहीं नही है
तेरा प्रियतम तुझसे कह दूँ
वह तो है चेतनता
इस अखिल ब्रह्माण्ड शाश्वत में
फिर संदर्भित क्या रह जाता है
जड़ या चेतन में ?
मैं हूँ ,तुम हो और प्रकृति
ये भ्रम है मन की चंचलता
एक वही है और न दूजा
समझो छोडो सब पंकलता
दुःख -सुख तो प्रतीति हैं मन की
कष्ट सभी इस तन के हैं
वह एक सदा ही निस्पृह है
प्रज्ञा बोध उसी के हैं
यह प्रपंच जो दीख रहा है
उसको तुम माया कह लो
वर्तमान क्षण आनंद भरा है
चिंता को दुःख कह लो
गतिमय है ब्रह्माण्ड सकल
चेतनता है भरी हुयी
कर्तत्व भाव को छोडो
देखो कर्ता है कहीं नही
नदियाँ गिरि से निकल निकलकर
दौडी जाती हैं सागर की ओर
बादल भी जल लेकर देखो
है भिगो रहा संसार छोर
मधुपों ने गुंजार किया
कलियों ने श्रृंगार किया
पर कहीं नही कोई कहता
हमने ये कर्म विशेष किया
पंछी गाते वृक्ष उग रहे
कलियाँ खिलती रहती हैं
धूप खिल रही,रात्रि जा रही
ऋतुएं बदला करती हैं
बजती है अनहद नाद कहीं
खिलती है करुणा की मुस्कान
सुधा छलकती पूरित करती
लो ! आ गए हमारे प्रियतम प्राण
अब तक मैं था , अब कहीं नही हूँ
सर्वस्व स्वतः खो जाता है
कैसे कहूं उस अनंत भाव को
कहने वाला खो जाता है
बिखर पड़ रहे शब्द मेरे
फ़िर भी तुम कहते हो बोलो
तो आओ अंतस में मेरे
देखो उसको तुम भी ले लो
पाकर मैं हूँ धन्य उसे
अब कही नही है जाना
जान चुका कैसे झूठा है
जगती का सब ताना-बाना
बस ! अब और नही कह सकता
वह अनंत है शब्द परे
अनुभूति सदा एकाकी है
वह चर्चाओं से सदा परे .
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