Wednesday, December 24, 2008

मन

इस प्रकम्पित चित्त का चिंतन
कितना अधूरा है ?
व्योम सा विस्तार जीवन का
अलग अनुभव सभी का
हमारी मान्यताएं और उनका टूटना
कितना अधूरा है ?
नही ये जानता मन कि
सपने झूठ क्यों होते ?
और जो है सच
वही परिणाम ढोना
क्यों जरूरी है ?

Saturday, December 20, 2008

प्रेम-बोध

जब मेरा प्यार
तुम्हारे लिए
अहंकार का कारण बना
और तुम्हारे द्वारा दिया तिरस्कार
मेरे आत्मबोध का ;
मैंने तुम्हे धन्यवाद दिया
ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर
और खुश हुआ
ईश्वरीय प्रेम पाकर .