Wednesday, December 24, 2008

मन

इस प्रकम्पित चित्त का चिंतन
कितना अधूरा है ?
व्योम सा विस्तार जीवन का
अलग अनुभव सभी का
हमारी मान्यताएं और उनका टूटना
कितना अधूरा है ?
नही ये जानता मन कि
सपने झूठ क्यों होते ?
और जो है सच
वही परिणाम ढोना
क्यों जरूरी है ?

Saturday, December 20, 2008

प्रेम-बोध

जब मेरा प्यार
तुम्हारे लिए
अहंकार का कारण बना
और तुम्हारे द्वारा दिया तिरस्कार
मेरे आत्मबोध का ;
मैंने तुम्हे धन्यवाद दिया
ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर
और खुश हुआ
ईश्वरीय प्रेम पाकर .

Friday, November 14, 2008

हर क्षण सुख है

मैंने कहा -
क्या मेरे दुःख का अंत है ?
उसने पूछा -
क्या सुख का अंत चाहते हो ?
मैंने कहा -
नही
सुख पाना चाहता हूँ
उसने कहा -
तो दुःख के लिए तैयार रहो
तुम्हारा चाहना ही दुःख है
बाकी हर क्षण सुख है .

Saturday, November 8, 2008

फ़िर से आई याद .....

बहुत दिनों के बाद
तुम्हारी फ़िर से आई याद
मचल उठा जी मिलने को
पर हार गई है आस

हार गई है आस
कहाँ से लाऊं फ़िर विश्वास
मूक धरा आकाश चराचर
मिटे कहाँ से प्यास

मिटे कहाँ से प्यास
मेरा मन हैं बहुत उदास
कि तुम नही हमारे पास
अब टूट रही है आस

बहुत दिनों के बाद
तुम्हारी फ़िर से आई याद .......

Saturday, November 1, 2008

दोस्ती निभती नही

सच कहा -
मुझसे दोस्ती निभती नही
निभे भी कैसे ?
तुम्हारे सतत आघात को
मैं सह नही पाता
अपनी पीड़ा को हँसकर
छुपा नही पाता
आत्मीयता के विस्तार में
सीमा रेखाएं ख्नीच नही पाता
दोस्ती के फासले जान नही पाता
अपनी परम अभिव्यक्ति रोक नही पाता
दोस्ती निभे भी कैसे
जब मेरी विनम्रता
तुम्हारे अहम् की पोषक बन जाए
तुम्हारी हँसी
मेरे हृदय पर कटाक्ष कर जाए
मेरा प्यार
तुम्हारे गर्व का हास बन जाए
दोस्ती निभे भी कैसे
जब मैं झूठ तुमसे कह नही पाता
तुम्हारा पतन सह नही पाता
वह जाल जिसमें आदमी फंसते हैं
बुन नही पाता .

Friday, October 24, 2008

क्षणिकाएं

अब तू नही तो क्या हुआ
ये फूल हैं ,ये रंग हैं
मैं तुझे ही देखता हूँ
ये आइने,ये दर्द हैं ।
* * * * * * * * * *
मेरे हर अश्क एक कहानी हैं
जिसे तुम कहते हो की एक पानी है
अपना साया देख सकते हो इसमें
मेरे अश्कों में तुम्हारी भी कहानी है
* * * * * * * * * * * * * * * * *
तुम्हारे इश्क का वो नूर है
जो दिख रहा चेहरे पर मेरे
लोग अक्सर पूछते हैं -
कौन थी वो ?
* * * * * * * * * * *
सागर की लहरों को गिनना
मेरी आदत पहले न थी
कुछ भी देखूं तुमको देखूं
ऐसी आदत पहले न थी
* * * * * * * * * * *
चट्टानों से टकराकर भी
लहरें हार नहीं मानतीं
प्यार एक पागलपन हैं
बुद्धि भला कब इसे आंकती ?
* * * * * * * * * * * * *
अपना सोचा कब होता है
नियति नटी पर मन रोता है
जग सारा जब सो जाता है
असमान तब क्यों रोता है ?
* * * * * * * * * * * * * *
मन्दिर में जा कर मैंने
कभी नही वरदान है माँगा
तेरे चरणों में शीश झुकाकर
यही कहा -"तुम भूल न जाना "
* * * * * * * * * * * * * * * *
ओस से भीगी हुयी
कंपती कली गुलाब की
जिंदगी कुछ इस तरह है
प्यार की और ख्वाब की
* * * * * * * * * * * * *
कौन जाने प्यार क्या है
जब समर्पण मौन है
कह नही सकता जगत में
क्या मौन सचमुच मौन है ?
* * * * * * * * * * * * * * * *
संकोचों के पाटों में पिसती इच्छा
अब शाम हो गई
कह न पाए जो कहना था
तनहाई अब आम हो गई
* * * * * * * * * * * * * * * * *
फूल का झरना नही इतिहास होता
समृद्धि के आगार पर दुःख का नही एहसास होता
है अगर तुममें कहीं विश्वास तो
तुम प्यार कर लो
ईश का वरदान कब अभिशाप होता ?
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
किसकी तलाश में हम
राह ये हैं तकते
डूबे हैं कई मंज़र
टूटे हैं कई सपने
* * * * * * * * * * * *
बस यूँ ही कह कर तुमने
मुझको अर्थ दे दिए कितने
सुलझाने में जिसको मैंने
दर्द बुन लिए कितने
* * * * * * * * * * * * * *
शमा को पतंगे से
भला कब प्यार होता है
बड़ा मासूम आशिक है
जो जल के खाक होता है ।

Sunday, October 12, 2008

कृतज्ञता

कितना हर्षित कर जाते हो
प्रिय तुम प्यार लुटाकर
कितने फूल बिछा जाते हो
पथ से कांटे उठा-उठाकर

कहूँ कहाँ तक प्रेम तुम्हारा
जो निस्सीम गगन सा है
पार न जा पाता मैं उसके
वह अनंत -अगम-सा है

हर सुबह नई किरणे देकर
तुम हर लेते हो मेरी पीड़ा
फ़िर सांध्य समय अंतस में आकर
झंकृत करते हो अन्तर वीणा

हर क्षण तुम अपनी कोरों से
संसार सकल को बदल रहे
मेरे गीतों मेरी थिरकन में
तुम ही हो जो मचल रहे

हर सबनम का कतरा-कतरा
मेरे दुखों का निष्कासन है
तुम उन्हें उठाकर हाथों से
जो देते हो वो दर्शन है

फ़िर हास्य मिले या दुःख भाई
वो शून्य शान्ति में खो जाता है
मैं भेद नही कर पाता हूँ
यही तुम्हारी समरसता है

हूँ कृतज्ञ पूर्ण तुमसे मैं प्रियतम !
जो जीवन संगीत मुझे हो देते
मैं जीता हूँ बस उन्हीं क्षणों में
जिनमें तुम मुझसे हो मिलते .

Wednesday, October 8, 2008

याद तुम्हे किसकी आती ?

रिमझिम रिमझिम झिमझिम झिमझिम
बरस रही जल धार यहाँ पर
भीनी-भीनी खुशबू उठती
बहती बसंत बयार यहाँ पर
झूम रहे हैं तरु पुलकित सब
कोयल मधुरिम गीत सुनाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

वर्षा की बूंदे हैं झरती
पायल के घुँघरू सी छुन-छुन
मन मेरा कहता प्रिय आओ
अंक मुझे ले तुम सो जाओ
हा ! पलकें मेरी झुक जातीं
सिहरन सी तन में उठ जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

इस उपवन के एकांत भवन में
बैठी हूँ वीणा सम्मुख
तुम आ जाते मैं छू तारों को
आज नया एक गीत सुनाती
पर हाय ! अकेली मैं चुनती हूँ
सपनों के सुंदर मोती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

जीवन ही संताप बना है
प्रेम यहाँ अभिशाप बना है
कौन जिए किसकी खातिर
अखिल विश्व ही त्रास बना है
विरह जन्य पीड़ा क्या होती
काश ! कि तुमको बतला सकती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

एक अनाम अतृप्त इच्छा सी
जीवन की सुधियाँ कुछ विष सी
दुविधा संभ्रम की विचलित करती
हत आहत मैं क्रंदन करती
फ़िर सुधियों की मदिरा पीकर
बेसुध जग से हो जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

मौसम दिलकश उस दिन था
मौसम दिलकश अब भी है
फ़िर भी लगता जीवन सूना
जैसे टूटा कोई सपना
मना रही जो रूठा अपना
मेरी कोशिश असफल जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

Saturday, September 27, 2008

आकांक्षा

तुम आक़र मेरे जीवन में
यूँ ही एक स्वर बन जाया करो
अधरों से मेरे गीत उठें तो
उनमें तुम मिल जाया करो

चंदन की खुशबू हो तुम
या रजनीगंधा फूल कोई
सुरभित कर जाती हो मुझको
तुम यूँ ही प्रसारित हुआ करो

जीवन-मरू की जलधार हो तुम
मेरे सपनों का साकार हो तुम
जो छू जाए मेरे मन को
ऐसी सुंदर मुस्कान हो तुम

मेरे नीरव से जीवन में तुम
कलरव बनकर यूँ हँसा करो
जब मैं चातक सा तृषित बनूँ
तुम स्वाति बूँद बन जाया करो

पतझड़ तो आए हरदम ही
मेरे जीवन के सांद्य समय
तुम उसमें भी बन दीप कोई
मेरा पथ आलोकित किया करो

तुम सजल करो मेरे नयनों को
दो अश्रु धार बह जाने दो
भर सकूं हृदय को भावों से
ऐसा अतुलित तुम प्यार करो

तुम हो अंतस का प्रपन्न भाव
झंकृत वीणा को किया करो
मेरी स्वर लहरी गूँज उठे
आशीष प्रेम का दिया करो .

Saturday, September 13, 2008

अद्वैत

अंधकार में आहट आती
बार-बार नीरव को चीर
कर जाती संतप्त हृदय को
दे जाती कलुषित सी पीर

कहते थे तुम उसकी संसृति
वो है जग का रचनाकार
पर ये त्रैताप जगत में इतना
क्यों करता है हाहाकार

फैला है उसके जग में क्यों
यह अशांत सा पापाचार
क्यों जग सारा मदिरा में डूबा
कर रहा निरंतर चीत्कार

कहते थे तुम वह है
सर्वज्ञ और अंतर्यामी
फ़िर बोलो क्या न समझ सका
इस जग की सिहरन खल-कामी

मेरे अन्तर की ज्वाला भी
देखो कितनी है धधक रही
कर रही तुम्हारे प्रियतम से
संवाद मौन में भभक रही

मैं नही मानता वह जग का
हो सकता है निर्माता
जिसको कहते तुम खेल-खेल में
यह जग सारा रच डाला

जब एक मनुष्य तृष्णा में पड़कर
पापी हो सकता है
तो इस तृष्णामय जग का वह निर्माता
कैसे बच सकता है

बंधे हुए से भटक रहे हैं
नक्षत्र और ग्रह तारे सारे
कहाँ स्वतंत्रता फ़िर जगती में
फिरते हैं मारे-मारे

ओ मेरे सूनेपन के साथी !
तुम भी कितने छलिया हो
रहकर साथ सदा ही मेरे
करते बातें उसकी हो

आओ आज तुम्हारे
सारे भ्रम को मैं क्षीदित कर दूँ
व्यक्ति रूप में कहीं नही है
तेरा प्रियतम तुझसे कह दूँ


वह तो है चेतनता
इस अखिल ब्रह्माण्ड शाश्वत में
फिर संदर्भित क्या रह जाता है
जड़ या चेतन में ?

मैं हूँ ,तुम हो और प्रकृति
ये भ्रम है मन की चंचलता
एक वही है और न दूजा
समझो छोडो सब पंकलता


दुःख -सुख तो प्रतीति हैं मन की
कष्ट सभी इस तन के हैं
वह एक सदा ही निस्पृह है
प्रज्ञा बोध उसी के हैं

यह प्रपंच जो दीख रहा है
उसको तुम माया कह लो
वर्तमान क्षण आनंद भरा है
चिंता को दुःख कह लो

गतिमय है ब्रह्माण्ड सकल
चेतनता है भरी हुयी
कर्तत्व भाव को छोडो
देखो कर्ता है कहीं नही

नदियाँ गिरि से निकल निकलकर
दौडी जाती हैं सागर की ओर
बादल भी जल लेकर देखो
है भिगो रहा संसार छोर

मधुपों ने गुंजार किया
कलियों ने श्रृंगार किया
पर कहीं नही कोई कहता
हमने ये कर्म विशेष किया

पंछी गाते वृक्ष उग रहे
कलियाँ खिलती रहती हैं
धूप खिल रही,रात्रि जा रही
ऋतुएं बदला करती हैं

बजती है अनहद नाद कहीं
खिलती है करुणा की मुस्कान
सुधा छलकती पूरित करती
लो ! आ गए हमारे प्रियतम प्राण

अब तक मैं था , अब कहीं नही हूँ
सर्वस्व स्वतः खो जाता है
कैसे कहूं उस अनंत भाव को
कहने वाला खो जाता है

बिखर पड़ रहे शब्द मेरे
फ़िर भी तुम कहते हो बोलो
तो आओ अंतस में मेरे
देखो उसको तुम भी ले लो

पाकर मैं हूँ धन्य उसे
अब कही नही है जाना
जान चुका कैसे झूठा है
जगती का सब ताना-बाना

बस ! अब और नही कह सकता
वह अनंत है शब्द परे
अनुभूति सदा एकाकी है
वह चर्चाओं से सदा परे .

Saturday, September 6, 2008

अभिज्ञान

संसृति में फैली है कितनी
नीरव शान्ति अपरमित
फैला है कितना आनंद
कभी नही रहा जो सीमित

फ़िर भी मनुष्य अनभिज्ञ
सदा ही दुःख सहता है
उसका जीवन तृष्णा बनकर
उसको ही छलता है

भूत भविष्य में भरमाया
वर्तमान को खोता है
बैठ विपिन की गहन छाँव
प्रात हेतु रोता है

आनंद खोजने चला किंतु
कहाँ उसे कब पता है
वह तो भीतर ही रहता
जब जगता तब पाता है

इतनी विस्तृत अवनी पर
शान्ति कहाँ न उसने खोजी
पर मिली वहां जहाँ स्वयं ही
मृत्यु खड़ी है रोती

अब तक तो वह भटक रहा था
अलियों-कलियों के सपने में
पर आज वही है रास रचाता
मरघट के सूनेपन में

सच है जीवन एक छलावा
जब तक हम सोते हैं
छालियाँ है उसकी मुस्कानें
जब तक हम दुःख बोते हैं

जब मिली हुयी है साँसें गिनकर
फ़िर क्यों अशांति ढोते हैं
प्रेम और करुणा से वंचित
भूले भटके जीते हैं

आओ आज संकल्प करें
हम नही सहेंगे मिथ्या को
तोडेंगे ख़ुद का अंहकार
पाएंगे अविकल श्रद्धा को

अब हम भी जानेगें जीवन को
क्या सचमुच उसमें रस है
क्या कहीं कोई शाश्वत अपरमित
हम हेतु प्रतीक्षा रत है ?

भर चुके बहुत तृष्णाओं को
फ़िर भी ये शेष रही हैं
फ़िर जाना ये दुष्पूरक हैं
कब जग में तृप्त रहीं हैं

अब तक तो आशा थी अमृत की
पर आज गरल को पी पाया
दृष्टि खोलकर हे शाश्वत !
अब जाना कितना भरमाया .

Saturday, August 23, 2008

श्रद्धांजलि

हे पितः !
तुम्हारे द्वारा दी गई
पूर्णाहुति
कैसे विसर्जित की जा सकती है
पानी में
उससे तो
अभिषेक करना है हमें
वो शोभा है
हमारे ललाट की
और स्मृति भी
कि-
जीवन भर संघर्षों कि ज्वाला में
जलकर
करते रहे वर्षा हम पर
स्नेह की
हे पितः !
तुम्हारे द्वारा दी गई पूर्णाहुति
व्यर्थ नही जायेगी
वह हमारे उद्विकास में
नवीन चेतना लाएगी
व्यक्ति उत्थान से
लोक उत्थान तक
अनवरत विजयी होगी
जो संकल्प तुमने दिया है
जिजीविषा बन
हममें सदा रहेगी
मुझे याद है तुम्हारी पुकार
जो निरंतर उठती है मुझमें
बन संकल्प ज्वार -
"उठो ! जागो !
और उद्यम को प्राप्त हो
निर्निमेष काल से अभिसिंचित
प्रगति का पोषण करो
प्रिय पुत्र ! हर स्थिति में
ईश पर विश्वास कर
शक्ति का संवरण करो " .

माँ

माँ
सिर्फ़ एक शब्द नही
एक भाव
ममत्व का
माँ
सिर्फ़ पोषक नही
एक प्यार
जीवन का
माँ
सिर्फ़ अस्थियों का ढांचा नही
एक आकार
स्नेह का
माँ
सिर्फ़ एक सम्बन्ध नही
एक स्रोत करुणा का .

Saturday, August 16, 2008

किस बात की तुमको हताशा ?

किस बात की तुमको हताशा
टूटती जब नही आशा
मानवी की प्रकृति है ये
जो बदलती जा रही है
रेत जैसी जिंदगी
हर क्षण फिसलती जा रही है
क्या हुआ जो एक स्वप्न
टूटा तुम्हारा
क्या हुआ जो एक साथी
छूटा तुम्हारा
प्रकृति है अनुरागिनी
अनुराग उसको है सभी से
तुम चलो अब साथ उसके
और देखो नए सपने
टूटकर भी नही खोते
ह्रदय अपने प्यार को
फ़िर तुम्हे कैसी निराशा
टूटती जब नही आशा
किस बात की तुमको हताशा .

समर्पण

आस्थाएँ टूटें नही
उस अनजान के प्रति
जो सदा ढांढस बंधाता
तुम हुए असफल
भला फ़िर क्या हुआ
हारना था एक को
तुम ही सही
एक कोशिश और हो
नए संदर्भों में
क्या पता तुम विजित हो
आख़िर भवितव्यता है
हाथ उसके
क्या पता तुम पा सको
सत्य अपने
खोजना तो सबको पड़ा है
रास्ता उस छोर का
मंजिलें आकर सभी
ख़त्म हो जाती जंहाँ
और है प्रारम्भ जिसपर
अनंत का वैभव निरंतर
धड़कनें कहतीं जहाँ हैं -
सत्य है केवल समर्पण .

बुद्धिजीवी भडुआ

अस्तित्व की सारी लडाई
रहें कैसे बनकर इकाई
सोचता हर मूढ़
देता स्वप्न की पागल दुहाई
स्वार्थ जिसका आत्मसीमित
कर रहा है बेहयाई
वासनाओं के लिए
वह ढूंढता है तर्क कोई
और उसको फेंककर वह मुस्कुराता
नही जिसमे शर्म कोई
ढोंग उसका है उसे भी सालता
यत्किंचित कभी
पर बुद्धिजीवी भडुआ बना वह
सोचता मैं हूँ सही
भूलता सम्बन्ध सारे
आत्मीयता मारकर
कर रहा दुष्कर्म सारे
नित धर्म को वह त्यागकर
कौन समझाए उसे
वह अनसुना है कर रहा
आत्मचेतस भाव को जो
मारकर है जी रहा .

Saturday, August 9, 2008

जाने क्यों

जाने क्यों
विश्वास नही होता
जो गुज़र गया
वह अतीत केवल भ्रम था
वह सम्बन्ध आत्मीय सा
जो हममे तुममे था
वो महज़ एक सपना था
तुम भूल गए मुझको
मैं तुम्हे भुला न पाया
शायद इसीलिए कि
जो जीवित है मुझमे अभी तलक
वो तुममे था कभी
बहुत निकट से पाया .

तुम्हारे आघात सहकर

तुम्हारे आघात सहकर
आंसू गिर नही पाये
शिलाओं पर उकेरे चित्र
जो यह कह नही पाये
कि-
वह शिल्पी नही था
जिसने मुझे निर्मित किया
मैं अभिव्यक्ति हूँ
इस शिला की
जिसने मुझे पैदा किया
तुम्हारे आघात सहकर .

रूपगर्विता

अनाम !
तुम फ़िर रूठ गए
बिना ये कहे कि
मेरी भूल क्या है ?
और मैं ........
मैं खोजा करता हूँ
उस कारण को
जो दरार बना है
हमारे बीच की जमीन में
कदम बढ़ाकर कई बार चाहा कि
लाँघ जाऊं वह दरार
लेकिन पता नही क्यों
मुझे लगता है
ऐसा करने में
तुम दोषी मुझे ही ठहराओगे
अपने रूठ जाने का
और फ़िर मैं
इंतज़ार करने लगता हूँ
ये सोचकर कि शायद
तुम ही मान जाओ या फ़िर
कारण दे जाओ
अपने रूठने का
मगर तुम्हारी खामोशी भी अजीब है
जो टूटती ही नही
हर बार मैं ही
पराजित-सा
विवश-सा
आ जाता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हे मनाने
अनाम !
इस बार ऐसा नही होगा
मैं अपने प्यार को
लाचार नही करूंगा
और न ही बनाऊंगा उसे -जरूरत
रहने दो खामोश
हमारे बीच के संवाद को
बढ़ती है तो बढ़ जाने दो
हमारे बीच इस दरार को
अपने ही अस्तित्व में
वो सब कुछ
जो तुममे चाहा-पा लूँगा
अतीत की स्मृतियों में झाँककर
ख़ुद को अपने ही प्यार से-भर लूँगा
जो मेरे अहम् का
एक टूटा हुआ हिस्सा है
और तुम्हारे अहम् में
जुडा एक किस्सा है .

Saturday, June 28, 2008

बदलते शब्द

ये शब्द भी अजीब आदमी होते हैं
पता नही क्यों
अपनी मासूम अर्थवत्ता को छोड़
ऐठें-ऐठें से रहते हैं
खोखले ,बेजान बिल्कुल बेसुरे से
दौड़े-दौड़े से फिरते हैं
अक्सर टकरा जाते हैं मुझसे
मैं इन्हे पहचानने की कोशिश करता हूँ
हाथ बढ़ाता हूँ
ये हाथ मिलाने से इन्कार कर देते हैं
एक दिन
बेहद आत्मीय सा लगने वाला
शब्द - प्रेम मिला
मैंने चाह गले लगा लूँ
मगर ये क्या !!
इसमें जो भी अच्छा था
मेरे अनुभव से सच्चा था
वो बदल गया था
जब मैंने बात करनी चाही तो
वह स्वार्थ में खो गया था
मैंने पूछा -
तुम्हारा साथी विश्वास कहाँ है ?
उसने चौंक कर कहा -
अरे वो !
वो तो आउट डेटेड हो चुका है
पुराने पीपल के पास
एक झोपड़ी में बीमार-सा रहता है
उसकी जगह मैंने
अपनी कंपनी में
शक को अपोइन्ट कर लिया है
मैं समझ गया
प्रेम भी स्वार्थ के वशीभूत हो
छला गया
तभी मेरे पास
मेरा पुराना मित्र अनुभव
दौड़ा-दौड़ा आया
कहने लगा -
क्यों बंधुवर !
किस सोच में पड़ गए
मैंने जो कुछ भी
अब तक तुम्हे दिखाया
उसे एक दम ही भूल गए
परेशां मत हो
इसके बदल जाने में
इसका दोष नही
दोष है उन चंद लोगों का
जो इसकी चर्चा करते हैं
लेकिन इसका साथ नही देते
तभी तो -
अकेला पड़ गया है
अर्थवत्ता से शब्द का
तलाक हो गया है
विश्वास जो था साथी
वो भी दूर हो गया है
फ़िर मैं ...
अपने मित्र अनुभव के साथ
देर रात तक शहर में घूमता रहा
बहुत पुराने अच्छे शब्दों से मिलता रहा
लेकिन ........
सभी बदल चुके थे
अनुभव ने कहा -
मित्र !तुम अब तक छले गए थे .

Tuesday, June 24, 2008

भवितव्यता

उसने
मौसमों की बातें करनी छोड़ दी
क्योंकि -
वो बदल जाते हैं
उसने
लोगों की बातें करनी छोड़ दी
क्योंकि -
वो बदल जाते हैं
अब वो खामोश रहता है
देखते हुए -
सागर की लहरों को
आती-जाती बहारों को
खिलते हुए फूलों को
गाते हुए भौरों को
अब उसे लगता है
चर्चाएँ बेकार है
सब कुछ कह चुकने के बाद भी
बहुत कुछ रह जाता है
जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है
समय की धारा में रहकर
अस्तित्व की भवितव्यता को जानकर .

Saturday, June 21, 2008

संशय

अब मुझे भय लगता है
हर उस ज़ज्बात से
जिसमें प्यार है ,विश्वास है
क्योंकि -
दोनों ही टूटे हैं
बड़ी निर्दयता से हत्या कर दी गई
उस मासूम बच्चे की
जो हँस सकता था
दूसरों को खुशियाँ दे सकता था
हाँ ! मैं भी रोया था
उसके कत्ल के बाद
और वो सभी
जो प्रेम करना जानते थे
जो विश्वास करना जानते थे
क्योंकि -
वो मासूम बच्चा हमारा
अभिन्न अंग था
इस विलाप पर
वो हँसा था
जिसमें हृदय नही था
जो मुखौटे लगाना जानता था
तभी शायद ,
मुखौटा बदलकर बोला था
आबादी बढ़ने न पाए इंसानों की
जो प्यार कर सकते हैं
उसे भय था कि
लोग विश्वास पर जी सकते हैं
तभी से मुझे भय लगता है
हर एक पर शक सा होता है
कि जैसे -
सब अभिनय कर रहे हों
मंच पर आकर
अलग-अलग मुखौटे पहनकर
कि जैसे -
वो यकीन खो चुकने के बाद भी
यकीन दिलाना चाहते हों
एक जादूगर की तरह
पल भर में मुझे
हवा पर लिटा देंगें
बस एक बार ऑंखें बंद कर दूँ
सदा के लिए सुला देंगे
लेकिन -
मेरी भी जिद है
आख़िर मैं क्यों शक करना छोड़ दूँ
जबकि -
दोनों ही टूटे हैं
-प्यार भी
-विश्वास भी .

अनाम पात्र

जिन पात्रों के बारे में
तुमने पढ़ा है
उनमें से कुछ
तुम्हे प्रभावित कर गए
हालाँकि ,
वो पात्र अब नही हैं
उन पात्रों के रचयिता अब नही हैं
मुर्दों की बस्ती में
वीरान सी रात में
जब तुम अकेले थे
कब्रों पर लिखे हर्फों को पढ़ लिया
मुर्दों की शक्लें कैसी होंगीं गढ़ लिया
उनमें से कुछ वफादार हो गए
कुछ दावेदार हो गए
कुछ महान और कुछ भगवान् हो गए
मानता हूँ रहे होंगे वो वैसे ही
जैसे तुमने गढे हैं
क्योंकि ,
तुम्हारा गढ़ना आधारहीन नही है
हर्फों से उनका रिश्ता हो
ये नामुमकिन नही है
पर सोचो तो उन पात्रों के बारे में
जो आज वर्तमान हैं
कहीं अधिक जीवंत
तुम्हारे गढे हुए मुर्दों से
तुम्हारी कल्पना से परे
यथार्थ में जीते
सुकरात की तरह
विष का प्याला पीते
ईसा की तरह
शूली पर चढ़ते
ये बात और है
ये प्रसिद्ध नही रहे
हमारे तुम्हारे बीच जीते रहे
उपनिषदों के दर्शन
गीता के उपदेशों का
जीवन में अनुपालन कर
नई अभिव्यक्ति देते रहे
और हम सब उन्हें देखकर
मूर्खों की तरह हँसते रहे
उपहास उड़ाता है काल भी
हमें हँसता देखकर
रुदन से भीगी पलकें खोलकर
यह कौन कह रहा है
आत्मबोध है -
-आत्मपीडन
-आत्मपीडन
-आत्मपीडन

Thursday, June 19, 2008

फ़िर कौन हारा ?

असित नभ में
आज जागा एक तारा
अर्थ मुझको दे गया
फ़िर कौन हारा ?
अहम् की चट्टान को जो तोड़ दे
बह गई वह करुण धारा
उड़ गए पांखी सभी
तोड़कर पिंजरे की कारा
फ़िर कौन हारा ?
हर हार में एक जीत होती है सखे !
जो दृष्टि को आयाम देती है नया
करके अलसित स्वयं को तुम
मत बंधो जंजीर से
स्वयं को विस्तार दो तुम
प्यार के औदार्य में
शिशिर कण से प्रकृति ने
अश्रु का है मोल जाना
सूर्य की किरणों ने आकर
पुष्प को कैसे संवारा ?
फ़िर कौन हारा ?
फ़िर कौन हारा ?
फ़िर कौन हारा ?

अन्वेषक

सारी साहित्यिक विधाएं
जीवन का लेखा हैं
जिसमें-
सब कुछ लिखने के उपरांत भी
बहुत कुछ छूटा है
और तब तक छूटा रहेगा
जब तक संसार है ..........
नही समझे ?
तीन आदमी भटक गए थे
नदी की धारा देखते हुए
सागर तट पर पहुँच गए थे
कुछ खोजते हुए
उनमें से एक -
तट पर बैठ कर
लहरें गिनता रहा
रचनाएँ करता रहा
जीवन छोटा था लहरें अनंत
एक दिन मर गया
तट की शिलाओं पर
उसका नाम लिखा रह गया
दूसरा -
सागर में कूद पड़ा
और डूब गया
ऊपर तैरती हुयी
लाश की बंद मुट्ठी में
मोती था
जो दूसरों के लिए मूल्यवान
पर उसके लिए निरर्थक था
हाँ ! वो दार्शनिक था
तीसरे ने-
आगे का मार्ग खोजा
नौका बनाई
और सागर को पार कर गया
दूर क्षितिज पर जाकर
आकाश बन गया
वह मुक्त था
कुछ ने कहा -
वह भक्त था
कुछ ने कहा -
वह संत था
और मैंने कहा -
वह अनंत था
समय की सीमाओं से दूर
जिसे आज भी देखता हूँ
-सागर में
-मोती में
-आकाश में

सम-सामयिक

तुम कहते हो -
लिखूं कुछ सम-सामयिक
जैसे कि-
न्यूज पेपर वाली घटना
जिसे तुमने पढ़ी थी
चाय की चुस्की के साथ
सरे आम एक औरत को
निर्वस्त्र कर घुमाया गया
या फ़िर ,
तंग गलियां आबाद हुयी हैं
जिस्मफरोशी के धंधे से
लिख सकता हूँ इन्हे मैं
चटपटी ख़बरों की तरह
लेकिन क्या ये वैसे ही
बेकार न हो जाएँगी
जैसे उस दिन का पेपर
जिसे तुमने रद्दी में बेंच दिया था
कविता
यथार्थ को कहती अवश्य है मित्र !
पर संस्कार को देते हुए
वह जीवन को हृदय से जोड़ती है
दृष्टि को नया आयाम देते हुए
ताकि -
तुम ओस की बूंदों में
किसी के आँसू देख सको
और सूरज की गर्मी में भी
उसके कल्याण को देख सको .

प्रगल्भिता

वह कभी झूठ नही बोलती
समय की सीमाओं में बंधकर
वह तो मात्र बचाव करती है
समाज के दुर्भेद्य यथार्थ से
जिसने पराभूत किया है
उसके हर एक मर्म को
आघात पहुंचाकर
वह रेत ही हो जाती
मगर उसे तलाश थी
स्वयं में उस मोती की
जो खारे जल की बूंदों से
निर्मित होती है
तभी शायद
कभी-कभी वो
झूठ बोल लेती है
मुस्कुराते हुए
अपनी नज़रों से
दूसरों को तोल लेती है .

Tuesday, June 17, 2008

लहरें

जब मैं चुप था
सागर तट पर
लहरें हँसकर मुझसे बोलीं
कर्म हमारे सभी अकारथ
उठती गिरती
चलती रहतीं .

बेवफा

छोड़कर वह जा चुकी है
ये मकां जो है मेरा
आ रहीं हैं चिट्ठियां
फ़िर भी उसी के नाम की
जी चाहता है
कह दूँ सबसे
वो यहाँ रहती नही
बेवफा है जिंदगी
हर किसी को मिलती नही .........
......कह रहे हो जी रहा हूँ
पर कहाँ मैं जी रहा हूँ
टूटा हुआ पत्ता हूँ यारों
नदी में बस बह रहा हूँ .

Monday, April 21, 2008

पुकार

विद्वेष और घृणा के लम्हों में
कुछ अनिर्वचनीय सा दर्द लिए
पराभूत हुआ मैं
काल की कठोरता से
की तुमने पुकारा ही कब ?
महज़ इसलिए कि -
आर्थिक युग में
जीते हुए भी मैंने
अर्थ की सत्ता स्वीकार नही की
मनुष्यता के लिए
मानवीय संवेदना की
पुकार की

Thursday, April 17, 2008

इयत्ता से

लेकिन अर्थहीन जीवन को
क्या संज्ञा दूँ
जबकि -
मेरी इयत्ता
मुझे ही रोकती है
उस गहराई तक पहुँचने के लिए
जहाँ मेरा आशय छिपा है
तभी तो-
अनगिनत आँसू की बूंदों के बाद भी
दुःख का एक टुकड़ा
कहीं रुका है
(बह जाने के लिए )
तुम्हारी स्वीकृति इयत्ता !
तुम्हारा प्यार इयत्ता !
क्या सचमुच बुरा है ?

समय

दुःख
चाहे सबको मांजे या न मांजे
समय
सबको मांजता है
और दे आघात
जीवन आंकता है .

सपने

सन्नाटा भी बोल रहा है
सुधियों के पट खोल रहा है
संभव है मैं बह जाऊँ
आशाओं के दीप जलाऊँ
और कामना मधुर-मिलन की
लिए साथ में सो जाऊँ
लहरों की कल-कल छल-छल में
पायल के घुँघरू बजते हैं
विश्वासघात होने पर भी
आँखों में सपने पलते हैं

विरह

पंछियों ने गीत गाए
भोर का नभ जाग जाए
खिल रहे हैं फूल कितने
रूप का माधुर्य छाये
फ़िर कौन व्याकुल चीखता-सा
कह रहा है -
तुम न आए
तुम न आए
तुम न आए

अनावृत्त उजास

दिन तो बीत गया
एक साया
जो साथ था
धूप के आते ही
छूट गया
और अंधेरे में
मैं अकेला रह गया
इस खामोशी में
अपनी यादें ही भेज दो
क्या पाता मैं
फ़िर से जी पाऊँ
दिन के उस अनावृत्त उजास में
जिसमें -
तुम्हारा मुख-कमल खिला था
और मैं
प्रेम-सरोवर में
निर्वस्त्र-सा खड़ा था

Sunday, April 13, 2008

आत्मीय

मेरा दुःख
तुम्हारी आँखों का आँसू
जाने क्यों बन गया
मैं तो सिर्फ़
एक परिचित था
तुम्हारा आत्मीय
कब से बन गया
इसकी ख़बर
न मुझे थी
न तुम्हे है
लेकिन ये सच है -
सहजता के आँसू
एकांत में भी बहते हैं
जो दिल के करीब होते हैं
वही आत्मीय होते हैं

Wednesday, April 9, 2008

दूरी का सौन्दर्य

चाँद की सुन्दरता
दिल में चुभी
एक छूरी है
उसका आकर्षण
हमारे बीच की दूरी है

तनहाई

मेरा सृजन तुम्हारे बिना
रुका हुआ है
कि जैसे
सूखी धरती में
कोई बीज बिना बारिश के
दबा हुआ है
बीज के साथ
सूखी धरती है
जो उसे प्यार करती है
मेरे साथ मेरी तनहाई है
जो मुझे प्यार करती है .

दो नही एक

तुम्हारे आगोश में
जब आई थी
दुनिया छोड़कर
तब -
तुम थे और मैं
दो नही एक
अब -
तुम नही
दुनिया भी नही
सिर्फ़ मैं अकेली
तुम्हारी यादों के आगोश में
दो नही एक

डायरी के दो पन्ने

मेरी डायरी के दो पन्ने
अब डायरी में नही हैं
उसी तरह
जैसे कुछ प्यारे सपने
जो आँखों में थे
अब नही हैं
डायरी के दो पन्ने
और मेरे सपने
दोनों ही बह चुके हैं
समय की धारा में
लेकिन .....
मैं बंदी हूँ अब तक
स्मृतियों की कारा में .

Monday, April 7, 2008

तुम आई तो....

तुमने मेरा प्यार नही स्वीकार किया
तो क्या मैं खुश हूँ
मेरे कहने पर तुम आई तो
हाँ न सही
न कह पाई तो
सोच रहा हूँ
मेरे कहने पर तुम क्यों आई
तुम्हे वहाँ आने का
समय याद तो होगा
जहाँ कहा था मैंने तुमसे
मेरा मिलना होगा
तुम तैयार हुई होगी
कपड़े बदले होंगे
बल संवारे होंगे
दर्पण में चेहरा देखा होगा
ये सब करते हुए
तुम्हारा मन
मुझे याद तो करता होगा ?
मैं खुश हूँ
मेरा प्यार क्षणिक ही अपनाया
तो क्या
दिया जबाब दो टूक
मेरा दिल टूटा
तो क्या
अब तक थी तस्वीर तुम्हारी
एक आईने में
टूट गया दिल
देख रहा हूँ
कई मायनों में
तुमने मेरा प्यार नही स्वीकार किया
तो क्या
मैं खुश हूँ
मेरे कहने पर तुम आई तो
हाँ न सही
न कह पाई तो .........

Sunday, April 6, 2008

सापेक्ष

कभी भी
किसी से कोई
संतुष्ट नही होता
क्योंकि -
कोई भी किसी के सापेक्ष
परिपूर्ण नही होता

तलाश

आने से पहले सोचा था -
जाना है
उनको तलाश होगी मेरी
जाने से पहले सोच रहा हूँ
क्यों आया था ?
मुझको तलाश थी किसकी ?

प्रतीक्षा

अन्तिम बार .......
जब मैंने कहा था -
फ़िर कब मिलोगी ?
तुमने कहा था -
धूप छिटकते ही
लेकिन .........
आज तक वो धूप नही छिटकी
जो मुझे समेटती
अपनी बाँहों में
जबकि
मैं ख़ुद बिखर गया
घास पर
ओस बनकर ........

Friday, April 4, 2008

कविता और सूरज

कविता
एक सुंदर झूठ है
जैसे
सूरज हमसे बहुत दूर है
फ़िर भी
वह हमे स्पर्श करता है
जैसे
कविता

अतीत कि ओर

आज तुम भी चले गए
अपनी स्मृति
मेरे पास छोड़कर
उन तमाम मित्रों की तरह
जिन्हें मैं अब भी
याद करता हूँ
उस खंडहर की भाँति
जिसके बचे हुए भग्न - भाग
दर्शनीय होते हुए भी
ले जाते हैं -
अतीत की ओर

अर्थवत्ता

शब्दों कि अर्थवत्ता
तब खोयी नही थी
जब कहा था -
प्यार है तुमसे मुझे
हाँ ! खो गयी
जब अनसुना सा कर दिया
जिस तरह
हर बात वो
सिर्फ़ जिसको
-लिख दिया
-पढ़ लिया
-और कह दिया

बंशी

मैं खोखला एक बाँस हूँ
और तुम हो वायु
जब मुझको परस कर तुम गुजरती
फूटते हैं स्वर अनोखे
जो प्रेम के अकथनीय शब्दों को
सहज ही व्यक्त करते
बिन तुम्हारे
मैं भला किस काम का
खोखला , बेजान
बिल्कुल बेसुरा
निष्प्राण - सा

Wednesday, April 2, 2008

खामोशी

अनगढ़ पत्थरों को
मैंने पढ़ा है
जो सुंदर हैं
देवालय की उस प्रतिमा से
जिसे किसी शिल्पी ने गढा है
तुम्हे जानती दुनिया शब्दों से
तुमने जिसे कहा है
मैंने तो आँखें देखीं हैं
खामोशी को पढ़ा है

जागते रहो

जब कहीं कोई
भावना मर रही होती है
तब उसे अभिव्यक्ति देने के लिए
मेरी भावना जग रही होती है
कि जैसे -
चाँद की पूर्णता पर
ज्वार उठता है
और कहीं कोई दूर
रात के सन्नाटे में
आवाज देता है
-जागते रहो
-जागते रहो

सह्धर्मियों से

कल मैं चला जाऊंगा
जब क्षितिज के पार
क्या कर सकोगे तुम मेरा
शेष है जो काम ?
यह बंधी तृष्णा नही है
और न है मोह
चाहता हूँ बहती रहे
स्रोतस्विनी की धार
इसलिए हूँ पूछता -
क्या कर सकोगे प्यार ?
ले लो सभी कुछ आज
स्वयं को तुम माँज
-यह आनंद
-यह शान्ति
-यह संतोष
-यह प्रेम
यह अंतस का प्रपन्न भाव
दुःख - सुख के प्रति समभाव
लिख सकोगे तुम तभी
वो शब्द जो हैं बह रहे
-इस वायु में
-इस गंध में
हैं जो
-अनंत आकाश में
सुन सकोगे -
प्रणव की ध्वनि
स्वयं में तुम डूबकर
कर सकोगे -
संधान तम का
अंतर्ज्योती को तुम देखकर

Sunday, March 30, 2008

कवि-सृजन

दूर की आहट
रात के सन्नाटे में
दे जाती है - एक खोज
उस खोज की अनुभूतियाँ ही तो हैं
जो काग़ज पर लिखी कविता है
अकेले में -
मेरे अस्तित्व की सीमा
जब असीम होती है
एक बूँद
जब सागर में विलय होती है
तभी तो उभरते हैं -
वो आकार
जो हैं शब्दों के प्रकार
फ़िर भी
कहाँ उतारा जा सकता है
अनभूतियों को शब्दों में
कहाँ ढूँढा जा सकता है
बूँद को सागर में
किंतु -
प्रयास कवि धर्म है
जीवन-प्रेषण ही उसका मर्म है
जो संगीत पैदा कर सके
हृदय को प्रेम भाव से भर सके
मनुष्य को प्रेरणा दे सके
उसकी चेतना जगा सके

आशा

पल-पल टूटती जिंदगी
साँसों की तरह
छोड़ जाती है - यादें
रात के बाद
जब चाँद डूब जाता है
दूब पर पड़ी
ओस की बूँदें
मेरे रुदन को दे जाती हैं -दिलासा
सूरज की एक किरण
तब लेकर आती है -
एक संकल्प
एक आशा
-आगे बढ़ने को
-शिखर पर चढ़ने को
-और साहस
-निर्भय हो जीने को

मेरा स्वरचित क्या है

मेरा स्वरचित क्या है बोलो ?
सब कुछ मिला मुझे है
एक संयोग
मुझे बनाता
अनगढ़ से कुछ रचकर
मूर्ति नही
जीवंत कला का द्योतक
कवि
कविता को व्यक्त नही करता
कविता
कवि को व्यक्त किया करती है
जो जीवन है
जो यौवन है
जन्म - मृत्यु जिसकी क्रीड़ा है
वह एक तत्त्व
दीप्तिमान हो
कान्तिमान हो
उर की मात्र यही पीड़ा है
वाणी की वीणा कहती है
मेरे उर की पीड़ा कहती है
मेरा स्वरचित क्या है बोलो ?

Saturday, March 29, 2008

कवि

पूर्णिमा रात्रि का एकांत
मेरे अस्तित्व का विस्तार
जिसमें सभी सोए हैं
अपने सपनों में खोए हैं
क्या दोस्त ,क्या रिश्ते
क्या पराये, क्या अपने
सबके अपने-अपने सपने
अभी जबकि
मैं जाग रहा हूँ
एक दस्तक
दरवाजे पर दे रहा हूँ
कोई जगने वाला नही
मेरा रुदन
इस एकांत को
भंग कर रहा है
दूसरे का दुःख
मुझे तंग कर रहा है
पर कौन चाहता है
मुक्ति दुःख से
कल सुबह होगी
लोग जागेंगे
पर तब मैं नही रहूँगा
उस जागरण में
मेरे गीत दोहराए जायेंगे
स्वर से स्वर मिलाये जायेंगे
पर तब मैं नही रहूँगा
हालांकि -
घास पर बिखरी ओस की बूँदें
मेरे जाने के बाद भी
मेरे अनुगामियों को
निर्वाण देंगी
उनके लिए प्रार्थना की थी
किसी ने ईश्वर से
की वो जागें
इसका प्रमाण देंगी

बारिश के बाद

भीगा मौसम
ढलती शाम
सर्द हवा चलती दिल थाम
सब कुछ है अब धुला-धुला
मौसम भी है खुला-खुला
कितना खुश हूँ
देख सभी को
भीगे पंछी ,भीगे पेड़
और दौड़ते बच्चों के
जाने- पहचाने ये खेल
खिले हुए हैं - केना ,पलास
गुलमोहर और अमलतास
देते हैं मुझको अनंत हास .

तितली से

तुम नही आई
तो क्या हुआ
धूप आई है
मैं इसी से बोल लूंगा
प्रेम है स्वभाव मेरा
भेद सारे खोल दूँगा

दूर प्रान्तर में खिला
एक पुष्प हूँ
स्वयं में परिपूर्ण हूँ
खिलना है स्वभाव मेरा
खिल गया हूँ

जीवन मिला है
सुगंध का सौरभ मिला है
मैं इसे बिखरा रहा हूँ
प्रेम है स्वभाव मेरा
मैं इसे फैला रहा हूँ

निमित्त

तुम्हारा नाम क्या है
ये जानकर
मैं क्या करूंगा
रूप है कैसा तुम्हारा
ये मापकर
मैं क्या करूंगा
सूर्य की किरणें
कभी क्या पूछती हैं -
कौन हो तुम ?
चंद्रमा की चाँदनी
क्या देखती है -
रूप को
फ़िर मैं ...
छुद्रतम एक अंश हूँ -
ब्रम्हांड का
दर्प क्यों इसका करूं -
मैंने किया है प्यार तुमको
सौभाग्य है मेरा मुझे
तुम मिल गए हो
प्रेम के विस्तार में
एक निमित्त
मुझको कर गए हो

Wednesday, March 26, 2008

प्रेमाद्वैत

मेरे होठों पर
कोई मुस्कान नही छिटकी
हालांकि ,
बसंत में आम बौराया
कोयल ने खुशी हो गीत गया

मेरे होठों पर
कोई मुस्कान नही छिटकी
हालांकि ,
सावन की घटायें - घिरीं और बरसीं
केकी रव ने गायी कजरी

पर नही छिटकी
मेरे होठों पर वो मुस्कान
जिसमें छिपा था-
तुम्हारा प्यार
बस छिटकी है तो
मेरी पीड़ा
मेरे आँसू की रजत धार
फ़िर भी तुम कहती हो
मुझमें नही प्यार ?

सच कहती हो
मुझमें नही प्यार
क्योंकि -
अब तक तुमको ढूँढा तुममें
जबकि -
तुम हो मुझमें

तुम दूर कहाँ हो मुझसे
मेरे निकट यहीं मुझमें
मेरी स्मृति में
मेरी आंखों में
मेरी धड़कन में
मेरी साँसों में

तुम ही तो
-इस बसंत में
-इस सावन में
-केकी रव में
-कोयल की मधुरिम द्वानी में
-इस बदली में
-इस कजरी में

Monday, March 24, 2008

सागर और सरिता

सागर
समेत लेता अपने भीतर
नदी,नाले ,वर्षा सभी के
जल को
नही दान करता अपनी
अतुल सम्पदा को
किसी तृषित की तृषा
नही बुझाता
स्वयं में स्वार्थ की छुद्रता
छिपाये रहता
तभी तो-
हो गया उसका खरा जल
नही जिसमें संगीत
झरने सा कल-कल
देखो यह -
लघु सरिता
निरंतर जो बहती रहती
अपनी निधि का दान करती रहती
है जिसका मृदु-पूत सा जल
गिरकर भी देता जो
संगीत कल-कल
और हमसे हंसकर कहता -
आगे बढ़ चल !
आगे बढ़ चल !

मनोकामिनी

वर्षों बाद......
तुम्हे देखा है
खिलकर सुगंध फैलाते
और
चमकते तारों से
ये फूल तुम्हारे

प्रकृति-दान

सामने जो गुलमोहर का पेड़ है
देखता हूँ छायी हुई है
आज उस पर हरितिमा
झूमता है वह
उसकी पत्तियां
और जब यह फूलता है
एक मादक लावण्य सा
तब रूप इसका
सहज ही मुझको बुलाता
मौन होकर भी मुझे यह
अनाहत संगीत का आनंद देता
बस यही - ऐसा नही
या कहो सारी प्रकृति की सम्पदा
मुझ पर न्योछावर हो रही है
मांग इसकी कुछ नही
हाँ ! शान्ति मुझको दे रही है ...

तुम्हारे आते ही

तुम्हारे आते ही
निःसृत हो जाती हैं
कितनी कविताएँ-प्रेम की
तुम सूरज हो
और मैं उद्यान
तुम्हारे आते ही
खिल उठती हैं
सारी कलियाँ एक साथ .

असीम के प्रति

तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
शब्द फ़ीके पड़ गए हैं
अहम् के विषवृक्ष मेरे
प्रेम में अब जल गए हैं
बस मौनता पर्याय है
इस प्रेम की
भाव अंतस में छिपे
शब्द सारे मर गए हैं
अश्रु की धारा निरंतर
झर रही है
करुणा तुम्हारी आदि से ही
बह रही है
भूल थी मेरी
तुम्हे पहचान न पाया
आकाश का विस्तार
मैं न माप पाया .

अंतरंगता

तुम्हारी अंतरंगता में
एक खुशबू है
जो बरबस मुझे खींच लेती है
जैसे गुलाब की कली
खिल जाने पर
और धरती बारिश से
भीग जाने पर .

Thursday, March 20, 2008

भोर की धूप

तुम आए बहार बनकर
क्या सजकर
क्या संवरकर
मैं देखता रहा -मूक होकर
काश !
कह पाता कि -
तुम क्या खूब हो
शरद ऋतु में
भोर की एक धूप हो .

कनेर का फूल

कनेर का पीला फूल
है आज भी मेरी
पुरानी डायरी के पन्नों में दबा
नही है इसमें - सुगंध ,रूप-रंग
जो उस समय था
जब मुस्कुराकर शरमाते हुए
तुमने दिया था
मगर है आज भी इसमें
वही आकर्षण
जो डायरी के खुल जाने पर
मुझे बरबस खीच लेता है
तुम्हारी स्मृति की ओर
है कौन सा जादू ?
नही हूँ जनता इसमें छिपा
कनेर का पीला फूल
है आज भी मेरी
पुरानी डायरी के पन्नों में दबा .

Monday, March 17, 2008

टूटना

मैं और तुम
एक दूसरे के पर्याय
लगते थे कभी
आज दूर हैं इतने की
शायद पहचानते नही
लेकिन क्यों ?
क्या मेरा तुम्हारा रिश्ता
ख़त्म हो गया ?
-नही
रिश्ते तो कभी नही बदलते
मौसमों की तरह
फ़िर ?
हाँ ! याद आया
तुमने कहा था एक बार
शायद अन्तिम बार
-मेरा तुमसे कोई स्वार्थ नही
-मेरा तुमसे ....

शिलालेख

कुछ पुरानी यादें
तुम्हारी कही बातें
मुझे फ़िर खड़ा कर देती हैं
वीराने से खंडहरों में
शिलालेख की तरह
जिसकी खामोशी भी
बयां करती है
दो कब्रों की दास्तान
जिसमें -
एक तुम्हारी है
एक मेरी है .

शायद

तब
प्यार हो सकता था
जब
उसे पता था
लेकिन शायद
तब
प्यार नही हो सकता था
जब
मुझे ये पता था
और इस होने न होने के बीच
कुछ ऐसा था
जो न मुझे पता था
न उसे पता था .

अनुभूति की खुशबू

लो -
ये मेरे अनुभूति के क्षण हैं
जिन्हें मैंने
शब्दों में बांधने का
असफल प्रयास किया है
शायद.....
तुम मेरी असफलता पर ही
खुश हो सको
जैसे की मैं खुश हूँ
अपनी आंखों से ढलके
दो आंसू की बूंदों को छूकर
अपनी सांसों को
तुम्हारे प्यार की खुशबू से भरकर .........

तुम्हारी स्मृति

सूनी सी साँझ में
तुम्हारी स्मृति
डूबते सूरज की लालिमा सदृश
याद दिलाती है
भोर की उस अरुणिमा की
जिसे मैं अब भी
अर्घ्य देता हूँ .......

प्रेमार्थ

सागर-तट पर खड़े होकर
गहराई नापी नही जाती
हो जाए प्यार तो
झिझको मत
डूब जाओ
क्योंकि -
मोती यूं पाई नही जाती
और फ़िर
मोती मिले या न मिले
डूबने वाला
मोती की आकांक्षा ही कब करता है
उसका तो डूबना ही
स्वयं को अर्थ देता है
प्रेम को मर्म देता है .

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारे प्रेम का एक स्वर
मेरे कंठ को तृप्ति दे गया
तुम्हारे प्रेम का एक हास
मेरे रुदन को सुवासित कर गया
तुम्हारे प्रेम का एक स्मरण
मेरी कल्पना को पंख दे गया
तुम्हारे प्रेम का एक बिछोह
मुझे अनंत मिलन की तृषा दे गया
तुम्हारे प्रेम का एक बन्धन
मुझे समस्त बंधनों से मुक्त कर गया !

अपनी बात

तुम्हारा ही स्मरण करके
लिख पता हूँ
वो जो जीवन की भाषा है
मेरे लिए एक उम्मीद एक आशा है
पतझर के बाद का मौसम
वो जो हमारा है तुम्हारा है
तमन्नाएँ पूरी कर देने वाला
एक टूटता सितारा है
सिर्फ इसलिए की -
हमारी संवेदनाओं में प्रतिबिम्बित
एक चेहरा तुम्हारा है..........