Thursday, June 19, 2008

सम-सामयिक

तुम कहते हो -
लिखूं कुछ सम-सामयिक
जैसे कि-
न्यूज पेपर वाली घटना
जिसे तुमने पढ़ी थी
चाय की चुस्की के साथ
सरे आम एक औरत को
निर्वस्त्र कर घुमाया गया
या फ़िर ,
तंग गलियां आबाद हुयी हैं
जिस्मफरोशी के धंधे से
लिख सकता हूँ इन्हे मैं
चटपटी ख़बरों की तरह
लेकिन क्या ये वैसे ही
बेकार न हो जाएँगी
जैसे उस दिन का पेपर
जिसे तुमने रद्दी में बेंच दिया था
कविता
यथार्थ को कहती अवश्य है मित्र !
पर संस्कार को देते हुए
वह जीवन को हृदय से जोड़ती है
दृष्टि को नया आयाम देते हुए
ताकि -
तुम ओस की बूंदों में
किसी के आँसू देख सको
और सूरज की गर्मी में भी
उसके कल्याण को देख सको .

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