Wednesday, October 8, 2008

याद तुम्हे किसकी आती ?

रिमझिम रिमझिम झिमझिम झिमझिम
बरस रही जल धार यहाँ पर
भीनी-भीनी खुशबू उठती
बहती बसंत बयार यहाँ पर
झूम रहे हैं तरु पुलकित सब
कोयल मधुरिम गीत सुनाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

वर्षा की बूंदे हैं झरती
पायल के घुँघरू सी छुन-छुन
मन मेरा कहता प्रिय आओ
अंक मुझे ले तुम सो जाओ
हा ! पलकें मेरी झुक जातीं
सिहरन सी तन में उठ जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

इस उपवन के एकांत भवन में
बैठी हूँ वीणा सम्मुख
तुम आ जाते मैं छू तारों को
आज नया एक गीत सुनाती
पर हाय ! अकेली मैं चुनती हूँ
सपनों के सुंदर मोती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

जीवन ही संताप बना है
प्रेम यहाँ अभिशाप बना है
कौन जिए किसकी खातिर
अखिल विश्व ही त्रास बना है
विरह जन्य पीड़ा क्या होती
काश ! कि तुमको बतला सकती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

एक अनाम अतृप्त इच्छा सी
जीवन की सुधियाँ कुछ विष सी
दुविधा संभ्रम की विचलित करती
हत आहत मैं क्रंदन करती
फ़िर सुधियों की मदिरा पीकर
बेसुध जग से हो जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

मौसम दिलकश उस दिन था
मौसम दिलकश अब भी है
फ़िर भी लगता जीवन सूना
जैसे टूटा कोई सपना
मना रही जो रूठा अपना
मेरी कोशिश असफल जाती
बिहँस सखी तुम कह जाती हो
याद तुम्हे किसकी आती ?

2 comments:

abhivyakti said...

rahul shubhkamnaon ke liye dhnyawad. tumhari kavitayen pahle bhi padhi hain par ras nishpatti aaj bhi utni hi hai.
jaya

योगेन्द्र मौदगिल said...

क्या बात है भाई
सुंदर कविता के लिये बधाई
निरन्तरता अपेक्षित