Saturday, March 29, 2008

कवि

पूर्णिमा रात्रि का एकांत
मेरे अस्तित्व का विस्तार
जिसमें सभी सोए हैं
अपने सपनों में खोए हैं
क्या दोस्त ,क्या रिश्ते
क्या पराये, क्या अपने
सबके अपने-अपने सपने
अभी जबकि
मैं जाग रहा हूँ
एक दस्तक
दरवाजे पर दे रहा हूँ
कोई जगने वाला नही
मेरा रुदन
इस एकांत को
भंग कर रहा है
दूसरे का दुःख
मुझे तंग कर रहा है
पर कौन चाहता है
मुक्ति दुःख से
कल सुबह होगी
लोग जागेंगे
पर तब मैं नही रहूँगा
उस जागरण में
मेरे गीत दोहराए जायेंगे
स्वर से स्वर मिलाये जायेंगे
पर तब मैं नही रहूँगा
हालांकि -
घास पर बिखरी ओस की बूँदें
मेरे जाने के बाद भी
मेरे अनुगामियों को
निर्वाण देंगी
उनके लिए प्रार्थना की थी
किसी ने ईश्वर से
की वो जागें
इसका प्रमाण देंगी

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